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‘पहले कर्तव्यों के प्रति सचेत हों, फिर अधिकारों की बात करें’

6 वर्ष पहले
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जूनापीठाधीश्वरस्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि आज हम अपने समाज में ग्राहकों को तो जगा रहे हैं पर साधक सोया पड़ा है। स्वामी जी ने कहा - जागो साधक जागो - क्योंकि भारत का अर्थ ही है प्रकाशरत, ज्ञानरत और आनंदरत देश। हमारे शास्त्रों और देश ने कभी कर्तव्यों के प्रति सचेत किए बिना अधिकारों की बात नहीं की इसलिए हमें अधिकारों से कहीं अधिक अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत होना चाहिए। अगर हमें लोक कल्याण की यात्रा पर कहीं जाना है तो रास्ते में हमारे शील और सदाचार ही काम आएंगे। हम पाप का समर्थन करके पुण्य के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकते।

स्वामी जी ने कहा कि ईश्वर स्वयंभू होकर भी शब्द की सत्ता में प्रतिष्ठित है। कवि उसे कहते हैं जिसके पास कल्पना है, रचना है और गति है। शब्द मारक और तारक दोनों होते हैं। उनसे श्राप भी दिया जा सकता है और वरदान भी।

करुणाजगे तब तक ज्ञान अधूरा : उन्होंनेकहा कि ऋषभ देव ने अपने सौ पुत्रों को ईश्वर की सत्ता का ज्ञान कराया और कहा कि जब तक करुणा जग जाए तब तक ज्ञान अधूरा है।







उन्होंने अपने पुत्र भरत को इसी ज्ञान के मार्ग पर चलाया और भरत के ही नाम पर हमारे देश का नाम भारत हुआ। उन्होंने कहा कि संन्यासी और राजा बिलकुल एक जैसे होते हैं। वे मधुमक्खी की तरह समाज से उतना ही लेते हैं जितने में समाज अपने को ठगा हुआ महसूस करे। मधुमक्खी फूल से रस लेती है और फूल कभी ठगा हुआ महसूस नहीं करता। उसका सौंदर्य भी नष्ट नहीं होता। ऊंचाई पर पहुंचकर भी कुछ आसक्तियां बार-बार धरती पर खींच लाती हैं और आसक्ति जब प्रचण्ड हो जाती है तब आदमी अपनी कर्तव्य निष्ठा के प्रति बेपरवाह होने लगता है।

पुण्य की परिभाषा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि हम पुण्य के काम करके कीर्ति की अपेक्षा करें क्योंकि पुण्य जब तक गोपनीय बने रहते हैं, वे अधिक प्रभावशाली होते हैं। हम मंदिरों के गलियारों में और धर्मशालाओं के द्वारों पर अपने नाम भले खुदवा लें पर इससे हमारा पुण्य क्षीण ही होता है।

कथा के चौथे दिन बुधवार को स्वामी जी का अभा कांग्रेस कमेटी के महासचिव एवं प्रभारी मोहन प्रकाश म.प्र. कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अरूण यादव कथा संयोजक अजय सिंह ने पुष्प गुच्छ भेंट कर स्वागत किया।