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रजिस्ट्री और नामांतरण होने के बाद भी नहीं मिले प्लॉट
को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी में गड़बड़ियों के लिए पूरी सरकारी व्यवस्था ही जिम्मेदार रही है। गड़बड़ियों की इस श्रृंखला में यह भी पता चला कि कई सोसायटी के सदस्यों ने प्लॉट की रजिस्ट्री के बाद नामांतरण भी करा लिया, लेकिन उन्हें प्लॉट नहीं मिला। रजिस्ट्री और नामांतरण के दस्तावेज लेकर वे लोग आज भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी में गड़बड़ियों की खबर दैनिक भास्कर में प्रकाशित होने के बाद लोग रोजाना भास्कर को अपनी व्यथा बता रहे हैं। लोगों का कहना है कि पंजीयन अौर सहकािरता विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के चलते ही हाउसिंग सोसायटी में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुईं। उपायुक्त सहकारिता आरएस विश्वकर्मा कहते हैं कि सदस्यों की शिकायत पर संचालक मंडल को नोटिस जारी किए गए हैं। कुछ मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। इस पर सदस्यों का कहना है कि सहकारिता के अफसर उन्हें सालों से यही जवाब दे रहे हैं।
सुधा मित्तल ने हिल टॉप सोसायटी में वर्ष 1982 में सदस्यता ली थी। उन्होंने प्लॉट की पूरी रकम जमा की। रजिस्ट्री भी कराई और नामांतरण भी करा लिया, लेकिन प्लॉट पर आज तक कब्जा नहीं मिला। योगेंद्र सिंह सिकरवार ने वर्ष 1997 में गौरी गृह निर्माण समिति में प्लॉट लिया था। रजिस्ट्री भी करा ली और नामांतरण भी हो गया लेकिन अब तक प्लॉट पर कब्जा नहीं मिला है। गौरी सोसायटी में ही रामसेवक रघुवंशी ने भी 2009 में रजिस्ट्री करा ली थी, लेकिन वे भी अब तक प्लॉट के लिए भटक रहे हैं।