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कफन में छिपा यथार्थवाद

7 वर्ष पहले
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आदिवासियोंके रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, संस्कृति आदि को दर्शाती प्रदर्शनी शनिवार को शहीद भवन सभागार में आयोजित की गई। चेतना सांस्कृतिक एवं जनकल्याण समिति की ओर से आयोजित लोक जनजीवन पर केंद्रित इस प्रदर्शनी के बाद सभागार में शाम के वक्त महान लेखक मुंशी प्रेमचंद की कृति ‘कफन’ का नाट्य मंचन भी किया गया।

प्रदर्शनीमें खूबसूरत ट्राइबल अार्ट

जनजातीयप्रदर्शनी में मध्यप्रदेश की विभिन्न आदिवासी समुदायों ने अपने वस्त्र, आभूषण और वाद्ययंत्रों का प्रदर्शन किया है। इसमें पाताल कोट से भारिया गोंड जनजाति और हरदा से कोरकू जनजाति की बनाई गईं कृतियांे का खूबसूरत कलेक्शन शामिल हैं।

संगीत और अभिनय का कमाल

शाम को संदीप श्रीवास्तव के निर्देशन में मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ की नाट्य प्रस्तुति भी दी गई। यह नाटक बुंदेलखंड की लोक नाट्य शैली ‘स्वांग’ पर आधारित रहा। इसमें स्वांग, अभिनय, संगीत और नृत्य के माध्यम से कलाकारों ने दर्शकों पर प्रभाव छोड़ने में कामयाबी हासिल की। नाटक की कहानी पिता घीसू, बेटे माधव और बहू बुधिया के इर्द-गिर्द घूमती है। नारी वेदना पर भारी पड़ते इंसानी स्वभाव के यथार्थ को प्रस्तुति में भावनात्मक रूप से दिखाया गया।

पुरुष ने किया महिला का रोल

इस नाटक में महिला का किरदार पुरुष कलाकार ने निभाया। इसके संगीत में पारंपरिक वाद्य यंत्र नगड़िया, मंजीरे, ढोल, सारंगी आदि का उपयोग किया गया। नाटक के कई दृश्यों में बुंदेलखंडी लोकगीत ‘गौरीलाल भज लइयो और इक बात मोरी सजनी गठियाले चुनरिया...’ भी गूंजा। इसमें मंच पर ब्रज किशोर, संदीप श्रीवास्तव, ठाकुर राज राजपूत, राजेश राजपूत, संतोष साहू आदि ने अभिनय किया। वहीं, प्रकाश परिकल्पना दिनेश नायर की रही।

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