भोपाल. राजधानी में जानी-मानी कंपनियों का लेबल लगाकर बड़े स्तर पर डुप्लीकेट सामान बेचा जा रहा है। इससे एक ओर तो वाजिब कीमत देने के बावजूद गुणवत्तापूर्ण सामान न मिलने से उपभोक्ता खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं, वहीं सरकार को भी सिर्फ भोपाल में ही राजस्व का करीब आठ करोड़ रुपए से ज्यादा का सालाना नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस फर्जीवाड़े में कई गिरोह सक्रिय हैं। सरकार ने पिछले साल कॉपीराइट एक्ट में संशोधन कर बौद्धिक संपदा का अधिकार दिया है। फिर भी पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पा रही है।
चाहे खाद्य सामग्री हो, कपड़े हों, इलेक्ट्रॉनिक आइटम हों या फिर कॉस्मेटिक्स। पायरेसी का कारोबार हर क्षेत्र में फैल चुका है। दैनिक भास्कर ने कुछ प्रमुख कंपनियों के इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर से इस बारे में बात की तो पता चला कि ब्रांडेड बैग, टायर-ट्यूब, डिओडरेंट, किताबें, कम्प्यूटर हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और कपड़ों को हल्के स्तर पर तैयार कर उन्हें नामी कंपनियों के लेबल लगाकर बेचा जा रहा है।
पुलिस को ज्यादा अधिकार
कॉपीराइट एक्ट-1957 में वर्ष 2013 में संशोधन किया गया है। इसमें डिजाइनिंग एक्ट, पेटेंट एक्ट और ट्रेडमार्क एक्ट को मिलाकर इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट (आईपीआर) या बौद्धिक संपदा का अधिकार के नाम से एक नया एक्ट तैयार किया गया है। कॉपी राइट एक्ट के तहत पहले संबंधित प्रोडक्ट से जुड़ी कंपनी ही कार्रवाई करती थी। संशोधन के बाद अब सब इंस्पेक्टर स्तर का अधिकारी भी स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकता है।
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