भोपाल. बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो.मुरलीधर तिवारी की डेनमार्क यात्रा विवादों में घिर गई है। इस यात्रा के भुगतान पर शासन ने आपत्ति लगा दी है। इसके चलते यूनिवर्सिटी की वित्त नियंत्रक और ऑडिट अधिकारियों ने कुलपति को इस यात्रा के लिए किया जाने वाला भुगतान रोक दिया है। ऑडिट ने कुलपति की इस यात्रा को ऑफिशियल मानने की बजाय व्यक्तिगत माना है। इस मामले को लेकर कुलपति और ऑडिट शाखा आमने-सामने आ गए हैं।
कुलपति ने अगस्त महीने में पांच दिन की डेनमार्क की यात्रा की थी। इस पर कुल तीन लाख रुपए खर्च हुए थे। इस दौरान उन्होंने डेनमार्क की एलबोग यूनिवर्सिटी के साथ करार किया था। इस करार के तहत बीयू और एलबोग यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट और फैकल्टी के बीच रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए आपसी सहयोग पर सहमति बनी थी। कुलपति ने इस करार की जानकारी कार्यपरिषद सदस्यों को अगस्त में ही हुई बैठक में दी थी, जिस काे सभी ने सराहा था। लेकिन बात जब इस यात्रा पर हुए खर्च के भुगतान की आई तो शासन और यूनिवर्सिटी ने नियमों को हवाला देकर अपने हाथ खींच लिए।
कुलपति प्रो. तिवारी ने इस यात्रा को नियम के अनुसार ही किया जाना बताया है। उनका कहना है कि अभी यूजीसी की ग्रांट नहीं आई है, इसीलिए ऑडिट को यूजीसी ग्रांट आने तक अन्य मदों से यात्रा का भुगतान करने को कहा है। लेकिन ऑडिट इस पर बेवजह आपत्ति लगा रहा है। वहीं ऑडिट के अधिकारियों की माने तो इस तरह की यात्रा के लिए अन्य किसी मद में भुगतान का प्रावधान ही नहीं है। इसके चलते उनका भुगतान रोक लिया गया है।
तीन लाख हुए थे खर्च
बताया जाता है कि कुलपति ने जब इस यात्रा की जानकारी से राजभवन और शासन को अवगत कराया तो जवाब में शासन ने आपत्ति लगाकर पत्र भेजा कि यात्रा का भुगतान न तो शासन करेगा और ना ही यूनिवर्सिटी प्रशासन। इस पत्र के अाने के बाद यूनिवर्सिटी की वित्त नियंत्रक विजयलक्ष्मी वारस्कर ने यूजीसी के नियमों का हवाला देकर इस यात्रा का भुगतान करने से मना कर दिया। इसकी फाइल जब ऑडिट के पास पहुंची तो वहां से भी भुगतान की फाइल वापस कर दी गई।
इसीलिए लगायी आपत्ति
यूजीसी ने बारहवीं पंचवर्षीय योजना के तहत प्रोफेसरों को विदेश में होने वाली कांफ्रेंस में हिस्सा लेने की मंजूरी दी हुई है। लेकिन ऑडिट का कहना है कि डेनमार्क की यात्रा के दौरान कुलपति ने किसी भी तरह की कांफ्रेंस में हिस्सा नहीं लिया है, इसीलिए इसे आधिकारिक यात्रा नहीं माना जा सकता है। सूत्रों की माने तो इस बात को लेकर कुलपति की वित्त नियंत्रक और ऑडिट के अधिकारियों के साथ तीखी बहस भी हो चुकी है।