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सिपेट बनाएगा पानी और धूप में गलने वाली पॉलीथीन, दो साल में बनकर होगी तैयार

7 वर्ष पहले
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भोपाल. अब देश में धूप और पानी में आसानी से गलने वाली पॉलीथीन बनाई जाएगी। इस बायोडिग्रेडेबल पॉलीथीन को बनाने में खाद्य पदार्थों में मिलने वाले स्टार्च का उपयोग किया जाएगा। यह पॉलीथीन सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सिपेट) भोपाल के वैज्ञानिक बनाएंगे। इसके लिए रिसर्च चल रही है, जो अगले दो साल में पूरी होगी।
सिपेट भोपाल में चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर पीके साहू ने बताया कि पॉलीथीन के कारण मिट्टी व पानी प्रदूषित हो रहे हैं। इसकी वजह पॉलीथीन का बायोडिग्रेडेबल न होना है। इस परेशानी को खत्म करने सिपेट ने बायोडिग्रेडेबल पॉलीथीन बनाई है, लेकिन अभी इसकी लागत काफी ज्यादा है।
इसे कम करने के लिए भोपाल और भुवनेश्वर सिपेट के वैज्ञानिक रिसर्च में जुटे हैं। रिसर्च प्रोजेक्ट के नतीजों पर भोपाल सिपेट में बायोडिग्रेडेबल पॉलीथीन बनाई जाएगी। साथ ही संस्थान के स्टूडेंट्स को भी इसे बनाने की ट्रेनिंग दी जाएगी।
सस्ती मिलेगी बायोडीग्रेडोबल पॉलीथीन
साहू के मुताबिक सस्ती बायोडीग्रेडोबल पॉलीथीन का निर्माण और सप्लाई शुरू होने के बाद व्यापारी मोटी पॉलीथीन का उपयोग बंद कर देंगे। मोटी पॉलीथीन की अपेक्षा बायोडीग्रेडोबल पॉलीथीन बाजार में सस्ती मिलेगी। उन्होंने बताया कि अभी बायोडीग्रेडोबल पॉलीथीन का एक पाउच तीन रुपए का मिलता है। इस कारण व्यापारी अभी 40 माई क्रोन से कम मोटाई की पॉलीथीन उपयोग करते हैं, जो पर्यावरण को प्रदूषित करती है।
10 दिन में होगी नष्ट
पीके साहू के मुताबिक बायोडिग्रेडेबल पॉलीथीन पॉली लैक्टिक एसिड (पीएलए) तकनीक से बनाई जाएगी। इसे बनाने के दौरान खाद्य पदार्थ के स्टार्च को केमिकल के रूप में मिलाया जाएगा। इसके उपयोग से पॉलीथीन को धूप और पानी मिलने पर, उसमें बैक्टीरिया पैदा हो जाएंगे, जो उसे सात से दस दिन के भीतर नष्ट कर देंगे। इस कारण मिट्टी और पानी प्रदूषित नहीं होगा। उन्होंने बताया कि यह पॉलीथीन शुरुआत में बाजार में 200 रुपए प्रति किलो की दर से बिकेगी। अभी यह की कीमत 370 रुपए किलो है।