मेडिकल छात्रों ने किया एमपी प्रीपीजी का विरोध

9 वर्ष पहले
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भोपाल।


सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के पीजी कोर्सेस में दाखिले के लिए एमपी प्रीपीजी कराने के नोटिफिकेशन के साथ इसका विरोध शुरू हो गया है। विरोध भी मेडिकल कॉलेजों के छात्र कर रहे हैं। विद्यार्थियों का तर्क है कि देश के सभी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेस टेस्ट फॉर पोस्ट ग्रेजुएशन (नीट - पीजी) के बाद एमपी प्रीपीजी कराना गलत है। सरकार के एमपी प्रीपीजी कराने के निर्णय के कारण विद्यार्थियों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।


गांधी मेडिकल से यूजी करने वाले डॉ. अभिजीत ने बताया कि सरकार ने 1 जनवरी को मप्र प्री-पीजी परीक्षा का नोटिफिकेशन जारी किया है। परीक्षा की तारीख 31 मार्च तय की गई, जबकि केंद्र सरकार के आदेश के बाद मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) नवंबर 2012 में राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा करवा चुकी है। कर्नाटक सरकार की याचिका पर भी फैसला जल्द होने वाला है। ऐसे में व्यापमं की वेबसाइट पर सरकार ने अचानक परीक्षा की सूचना जारी कर दी जबकि वह ऐसा नहीं कर सकती। उन्हीं के साथी डॉ. अमित रहंगडाले ने राज्य सरकार पर एमपी प्रीपीजी कराकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। साथ ही परीक्षा कराने के पीछे सरकार के स्वयं के हितों को बताया है।

बिना नोटिफिकेशनकरा रहे परीक्षा

गांधी मेडिकल कॉलेज के यूजी इंटर्न डॉ. अजय कुमार ने बताया कि मेडिकल की परीक्षाओं में धांधली दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने नीट पीजी कराने का निर्णय लिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेशित किया कि इस आदेश के पूर्व जिन राज्यों ने प्री-पीजी परीक्षा का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है, वे परीक्षा करवा लें, लेकिन जिन राज्यों में नोटिफिकेशन नहीं हुआ है, वहां परीक्षा नहीं हो सकती। बावजूद इसके राज्य सरकार एमपी प्रीपीजी करा रही है, जिसका नोटिफिकेशन एमसीआई के नोटिफिकेशन के बाद जारी हुआ है।

विरोध करना गलत

॥इस साल एमपी प्रीपीजी होगी। इसका मेडिकल स्टूडेंट्स के द्वारा विरोध करना गलत है। नीट पीजी से राज्य के मेडिकल कॉलेजों में राज्य के छात्रों को कितनी सीटें आरक्षित रहेंगी ? इस संबंध में नियम भी स्पष्ट नहीं है। इस कारण राज्य सरकार शुरुआत से नीट पीजी का विरोध कर रही है।
अनूप मिश्रा, मंत्री, चिकित्सा शिक्षा

विद्यार्थियों के तर्क
- विभाग और व्यापमं की मिलीभगत से फर्जी छात्र एडमिशन पा जाते हैं और काबिल छात्र की रैंक तक नहीं आती।
- एक फॉर्म भरने में तीन से चार हजार रुपए लगते हैं। मप्र प्री-पीजी का फॉर्म भरने का शुल्क डेढ़ हजार रु. है जबकि नीट परीक्षा में भी 3800 रुपए खर्च हुए। आने-जाने का खर्च अलग। ऐसे में छात्रों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।
- जब नीट से केंद्रीयकृत मेरिट लिस्ट तैयार होना है, फिर राज्य सरकार को अचानक परीक्षा करवाने की क्या सूझी?
पैसा व मैन पॉवर क्यों बर्बाद किया जा रहा है?
- महाराष्ट्र, गुजरात सहित अन्य राज्यों में केंद्रीय परीक्षा से ही सीटें भरी जाना है। फिर ऐसी क्या खास बात है कि राज्य सरकार परीक्षा करवाने पर आमादा है।
- प्राइवेट कॉलेजों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार यह कदम उठा रही है।