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डाउनलोड करेंनासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट ने हाल ही में जारी एक रिसर्च पेपर में कहा है कि परमाणु संयंत्रों के कारण जितने लोगों की मौत हुई है, उससे कहीं अधिक लोग इसके कारण आज जिंदा हैं। रिसर्च पेपर के लेखक पुष्कर खरेचा और जेम्स हैनसन के अनुसार परमाणु ऊर्जा की वजह से अब तक 18 लाख लोगों की जान बच चुकी है। उनका तर्क है कि पिछले कुछ दशकों में जितनी बिजली परमाणु संयंत्रों से बनाई गई है, अगर उतनी बिजली जीवाश्म ईंधन (जैसे कोयला, पेट्रोल, गैस) के इस्तेमाल से बनाई जाती तो उससे उत्सर्जित होने वाले कार्बन के कारण कम से कम 18 लाख लोगों की मौत हो गई होती।
यही नहीं, अगले चार दशकों में परमाणु ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल के कारण 70 लाख और लोगों की जान बचेगी। परमाणु ऊर्जा का समर्थन करने वालों के पास ऐसे एक नहीं, ढेरों तर्क हैं, जिनमें उसे इकोनॉमिकल, सेफ और क्लीन एनर्जी सोर्स बताया जाता है। परमाणु ऊर्जा का विरोध करने वाले इसका संबंध न्यूक्लियर डिजास्टर, न्यूक्लियर वेस्ट के निपटारे की समस्या और बीमारियों से जोड़ते हैं।
फुकुशिमा परमाणु संयंत्र जैसी दुर्घटनाएं विरोधियों के तर्कों को और बल देती है। ऐसी दुर्घटनाओं के बावजूद आज जिस तरह से पूरी दुनिया को ऊर्जा की जरूरत है, उसके मद्देनजर परमाणु ऊर्जा की अनदेखी नहीं की जा सकती। वैसे परमाणु ऊर्जा पर बहस कोई नई नही है। 1979 में हुए थ्री माइल आइलैंड न्यूक्लियर एक्सीडेंट और 1986 में हुए चेर्नोबिल न्यूक्लियर डिजास्टर के पहले भी इस पर तमाम लोग चिंता जता चुके हैं।
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