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...बस, नहीं मिला तो मां का आंचल, इन बच्चियों की है दर्द भरी कहानी

9 वर्ष पहले
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भोपाल। ओ री चिरैया। नन्ही सी चिड़िया.आंगन में फिर आना रे.। गीतकार स्वांनद किरकिरे के ये बोल बेटी को समर्पित हैं। जब ये पंक्ति कोई सुनता है तो उसके मन में नन्ही कली के समान बच्ची की कल्पना हिलोरें लेने लगती है, लेकिन समाज का एक काला पक्ष भी है। विश्वास नहीं होता तो जानें भोपाल के मातृछाया में रह रहीं ८ मासूम बेटियों को फेंके जाने की कहानी। इन बच्चियों की व्यथा सुनकर लोगों के मुंह से यही ही बात निकलती है कि क्या माता-पिता इतने निष्ठुर भी हो सकते हैं?



मां, मैं तुम्हें कभी माफ नहीं कर सकती



मां, मेरा क्या कसूर था जो तूने मेरे साथ ऐसा सलूक किया। भले ही लोग मुझे अब अमृता के नाम से पुकारे, लेकिन तू तो जानती है कि मेरे साथ तूने कैसा व्यवहार किया। नहीं मालूम तुम्हारी क्या मजबूरी थी, जो तुमने मुझे कचराघर के पास गर्म पाइप में छोड़ दिया। यदि वहां पन्नी बीनने वाली नहीं आती तो शायद मैं दुनिया में ही नहीं होती। मातृछाया में मुझे एक परिवार मिल गया है। पर मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी..।



क्या मैं यूं ही अनाथ रह जाऊंगी..



मां, तुमने तो मुझे बोझ समझकर फेंक दिया था। भला हो होशंगाबाद पुलिस का, जिसने मुझे भोपाल मातृछाया भेज दिया। यहां मुझे आई-बाबा का प्यार मिला। उन्होंने मेरा नाम पूनम यह सोचकर रखा कि मैं पूनम की चांद की तरह किसी के आंगन में खेलूंगी, लेकिन जैसे-जैसे बड़ी हो रही हूं अहसास हो रहा कि कहीं कोई कमी है। मुझे मां चाहिए मेरी अपनी मां..। यहां लोग आते तो हैं, लेकिन मुझे पसंद कोई नहीं करता। क्या मैं ऐसे ही अनाथ रह जाऊंगी?



बच्चा गोद लेना हो तो..



- दंपती (पति-पत्नी दोनों) की उम्र का योग 90 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए।



- दंपती को आवेदन के साथ इनकम सर्टिफिकेट देना जरूरी



- आवेदक का वेतन न्यूनतम पांच हजार रुपए प्रतिमाह होना चाहिए।



- आवेदक दंपती का मेडिकल टेस्ट होता है, जिसमें देखा जाता है कि उन्हें बच्चा होने की गुंजाइश है या नहीं। यदि है तो ऑपरेशन होने के बाद ही बच्चे को गोद दिया जाता है।



- बच्चा देने में नि:संतान दंपति को प्राथमिकता दी जाती है।



-आवेदक दंपती का पुलिस सत्यापन एसपी ऑफिस से करवाया जाता है।



- आवेदक के घर का दौरा किया जाता है।



-आस-पड़ोस के वातावरण और सुविधाओं के साथ घर की व्यवस्थाओं को देखा जाता है।



- बच्चे को सुपुर्द करने के बाद आवेदक के घर 10 साल तक प्रति वर्ष दौरा कर फॉलोअप रिपोर्ट तैयार की जाती है।



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