भोपाल. ‘राज जो कुछ हो इशारों में बता भी देना, हाथ जब उससे मिलाओ दबा भी देना, वैसे इस खत में कोई बात नहीं है, फिर भी पढ़ लो तो ऐहतियातन जला भी देना।’ मशहूर शायर डॉ. राहत इंदौरी के इस शेर को सुनकर हर उम्र के श्रोता हास्य रस की बारिश में भीग गए।
यह नजारा था गुरुवार को आइसेक्ट यूनिवर्सिटी में आयोजित हास्य कवि सम्मेलन का। इसमें डॉ. राहत इंदौरी और कवि प्रदीप चौबे समेत अन्य कवियों ने श्रोताओं के सामने इश्क और हंसी की शानदार महफिल सजाई।
माहौल को देखकर हुई शेरो-शायरी
कवि सम्मेलन में शायरों ने माहौल के हिसाब से शेरो-शायरी की। यहां जयपुर के संपत सरल ने कहा ‘
फेसबुक में 5 हजार दोस्त हैं और परिवार में बोलचाल बंद है। तब हमारा जीवन कछुए की तरह था, आज खरगोश की तरह दौड़ रहे हैं। भाग हर कोई रहा है पर पहुंचना कहीं नहीं है।’ इसके बाद डॉ. राहत इंदौरी ने माहौल बनाना शुरू किया।
उन्होंने पहला शेर पढ़ा ‘लहूलुहान पड़ा था जमीं पर एक सूरज, परिंदे अपने परों से हवाएं करने लगे। अजीब रंग था मजलिस का, सफेद पोश उठे सांय सांय करने लगे।’ इसके बाद उन्होंने पढ़ा, ‘सबको रुसवा बारी-बारी किया करो, रोज वही कोशिश जिंदा रहने की, मरने की भी कुछ तैयारी किया करो।’ फिर उन्होंने सुनाया, ‘गांव की सब तितलियों के हाथ पीले हो गए।
क्या जरूरी है करें विषपान शिव की तरह, सिर्फ जामुन खा लिए और होंठ नीले हो गए।’ इसके बाद बारी आई उनके पॉपुलर शेर की, जिसमें उन्होंने कहा, ‘उसकी कत्थई आंखों में है जंतर-मंतर सब... चाकू वाकू छुरियां वुरियां खंजर वंजर सब, जिस दिन से तुम रूठी मुझसे रूठे-रूठे हैं, चादर वादर तकिया वकिया बिस्तर विस्तर सब।’
अब मौका था ग्वालियर के हास्य कवि प्रदीप चौबे की चुटकियां लेने का। उन्होंने अपना पहला शेर पढ़ा, ‘साली ने जीजा से कहा जीजाजी मैं पास हो गई मिठाई खिलाओ, जीजा ने साली से कहा थोड़ी और पास हो जाओ।’ कार्यक्रम में कानपुर के कवि प्रमोद तिवारी ने भी शेर पढ़े। कार्यक्रम का संचालन विनय उपाध्याय ने किया। इस मौके पर आइसेक्ट यूनिवर्सिटी के चांसलर संतोष चौबे समेत अन्य लोग उपस्थित थे।