बैतूल. डेढ़ सौ सालों से अंधेरे को रोशन करने वाली टिगरिया गांव में बनने वाली मोर चिमनी की चमक अब अमेरिका में भी नजर आएगी। टिगरिया गांव के कलाकार बलदेव वाघमारे को न्यू मैक्सिको में होने वाले इंटरनेशनल फोक आर्ट मार्केट के लिए निमंत्रण आया है। इसका आयोजन अक्टूबर के पहले सप्ताह में होगा। बारीक नक्काशी से बनी मिश्रित धातु की मोर चिमनियां गांव में बिजली नहीं होने के कारण पहले घर-घर में जलाई जाती थीं,लेकिन अब यह धातु-शिल्प की दुनिया में अपनी चमक बिखेर रही है। इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय खजुराहो के जनजाति संग्रहालय, दिल्ली के सेंट्रल कॉटेज, में इन मोर चिमनियों को सजाने के लिए बुलाया जा चुका है।
पीतल, तांबा और कांसा मिलाकर बनाते है चिमनी
मोर चिमनी को पीतल, तांबा और कांसा धातुओं को मिलाकर बनाया जाता है। इन धातुओं को पिघलाकर एक खोखला पात्र बनाया जाता है। इस पात्र को मोर के आकार में ढालकर इस पर बारीक तारों से नक्काशी करके डिजाइन बनाए जाते हैं। पात्र में ढक्कन हटाकर मिट्टी तेल भरा जाता है। खास बात यह है कि चिमनी की आग की गर्मी के बावजूद इस चिमनी की रंगत फीकी नहीं पड़ती है।
मोर चिमनी आज भी भरेवा जाति के लोग नवदंपत्ति को उपहार में देते हैं। इसके अलावा 600 से 1250 रुपए में यह चिमनी ऑर्डर देकर भी बनाई भी जाती है।
तीन पीढ़ियों से बना रहे
बलदेव का परिवार तीन पीढ़ियों से मोर चिमनी बनाता आ रहा है। बलदेव को उनके पिता सुखराम (85) ने चिमनी बनाना सिखाया था। पिता को दादा ने यह कला सिखाई थी।
(मोर चिमनी)