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जन्म दिन पर विशेष : संतजी की सेवा भावना बसती है यहां

7 वर्ष पहले
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(संत हिरदाराम - फाइल फोटो)
भोपाल. कहीं बच्चे हो रहे शिक्षित, कहीं रोगियों का हो रहा इलाज, तो कहीं बूढ़ों की हो रही सेवा। यहां संतजी ने आकर किया था अपने सपनों को साकार। अब सिद्धभाऊ सेवाधारियों के साथ मिलकर स्वामी हिरदाराम जी के बताए अनुसार विभिन्न सेवा कार्यों को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। यही कारण है कि सात समंदर पार से भी सेवा गतिविधियाें में भरपूर सहयोग मिल रहा है...
संत स्वामी हिरदाराम जी और उनकी प्रेरणा से जोड़ने वाली कई इमारतें संत हिरदाराम नगर (बैरागढ़) में हैं। यह महज इमारतें नहीं बल्कि उस महान पुजारी के वह मंदिर में हैं, जिनमें कहीं बच्चों को परमेश्वर का यार मानकर शिक्षित किया जा रहा है, कहीं बूढ़ों की सेवा की जा रही है तो कहीं बीमारों को निरोगी काया और नेत्र ज्योति दी जा रही है। आज स्वामी हिरदाराम जी के जन्म दिवस पर कुछ ऐसे पलों से जोड़ रहे हैं, जो संतजी ने साकार किए थे।
संतजी का आशीर्वाद है किशनचंद टी शाहनी
नवयुवक सभा की शैक्षणिक संस्था किशनचंद टी शाहनी को भी इमारत संतजी के आशीर्वाद से मिली थी। बच्चों के लिए शिक्षण संस्थानों की संतजी ने अपने ही जीवनकाल में श्रंखला सी बना दी थी, नवयुवक सभा का केटी शाहनी स्कूल भी उसी की एक कड़ी है। खाली जमीन पर संतजी के पैर पड़ते ही वह स्कूल भवन में तब्दील हो गया था। 1990 में संतजी स्कूल भवन की भूमि पर आए थे। इस विद्यालय में भी कम आय वर्ग के बच्चे अध्ययन करते आए हैं। स्कूल निर्माण हेतु राशि की कमी संतजी के अनुयायियों ने नहीं होने दी थी। यह संस्था वन ट्री हिल्स पर संतजी के सेवा कार्यों का साक्षी बना हुआ है।
संतजी की साधना का सफर
> वर्ष 1944 में एक अलग आश्रम सिंधु के भिरिया शहर में ही स्थापित किया।
> वर्ष 1947 जून में स्वामी जी के गुरु संत हरीराम साहिब ब्रह्मलीन हुए। कुछ समय के लिए स्वामीजी विचलित हुए।
> वर्ष 1947 में भारत-पाक विभाजन के वक्त स्वामी जी खाली हाथ हिन्दुस्तान आए। कुछ समय जोधपुर रहने के बाद भ्रमण करते रहे।
> वर्ष 1949 में स्वामीजी अजमेर के पास पुष्कर पहुंचे। वहां घने जंगल में तपस्या करते रहे।
> वर्ष 1956 में स्वामीजी बैरागढ़ पहुंचे और एक छोटी सी कुटिया में रहने लगे।
संतजी ने आकर दिया था आशीर्वाद
दीपमाला पागारानी पब्लिक स्कूल भी संतजी के आशीर्वाद से आकार लेने वाला विद्यालय है। 1994 में इस विद्यालय की आधारशिला रखी गई थी। संतजी स्वयं आए थे, विद्यालय भवन स्थल पर। आज संस्कार स्कूल की भव्य इमारत में सैकड़ों बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। शिक्षण की दृष्टि से यह संस्कार उत्कृष्ट शिक्षण संस्थानों में अपना नाम दर्ज कराता है। स्कूल में शिक्षा के साथ संस्कार देने का काम भी विद्यालय के नाम के अनुरूप किया जा रहा है। संस्थान के लोगों को मानना है कि संस्था के संचालन में हर पल संतजी का साथ होता है। कभी किसी तरह की कमी बच्चों को यहां नहीं हुई है। संतजी के अनुयायी समाज सेवियों की कृपा दृष्टि भी बनी रहती है। इस संस्था के पदाधिकारी पूर्ण सेवा भाव से कार्य करते हैं, इसी का परिणाम है कि संस्कार विद्यालय दिनोंदिन शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है।
बालिका शिक्षा का पहला पड़ाव
जब संतजी को लगा यहां की बच्चियां कैसे दूर जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाएंगी, तो उन्होंने संत हिरदाराम नगर में पंडित दीनदयाल कन्या महाविद्यालय की आधारशिला रखी। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षण का दायित्व संभाल रही नवयुवक सभा को इसके संचालन का जिम्मा सौंपा गया। संतजी के सेवाभावी अनुयायियों ने 1992 में कॉलेज के लिए इमारत को आकार दे दिया। यह उपनगर पहला गर्ल्स कॉलेज था। भले ही आज संतजी की प्रेरणा से उत्कृष्ट और आधुनिक शिक्षा के लिए संत कॉलेज है, लेकिन बालिकाओं को उच्च शिक्षा देने वाला डीडी कॉलेज सबसे पुराना संस्थान है। आज भले ही संतजी ब्रह्मलोक में वास कर रहे हैं, लेकिन उनकी कर्मस्थली बैरागढ़ में दीनदयाल कॉलेज की छाया में बच्चियां शिक्षा ग्रहण कर रही हैं।
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