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NOBEL विजेता के संघर्ष की कहानी: पत्थर पर आटा गूंथकर बनाई थी रोटियां

7 वर्ष पहले
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(फाइल फोटो: कैलाश सत्यार्थी)
विदिशा. शांति के लिए 2015 का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से मध्यप्रदेश (विदिशा) के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को बुधवार को दिया गया। विदेशी मूल की मदर टेरेसा के बाद भारत की किसी शख्सियत को शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में जन्मे कैलाश सत्यार्थी बचपन से ही कुरीति विरोधी रहे हैं। उन्होंने सम्राट अशोक अभियांत्रिकी महाविद्यालय से इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की। सत्यार्थी के साथी वेद प्रकाश शर्मा बताते हैं कि गरीबी कभी उन्हें डिगा नहीं सकी। हाल यह था कि उनके पास आटा गूंथने के लिए बर्तन नहीं था और वह पत्थर पर आटा गूंथकर रोटी बनाया करते थे। शर्मा बताते हैं कि सत्यार्थी चर्चाओं में तब आए जब उन्होंने विदिशा में महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास सफाई कामगारों से भोजन बनवाया था। उनके इस गांधीवादी कदम ने नई बहस को जन्म दिया।
ऐसे शुरू हुई हक की लड़ाई

सत्यार्थी ने बच्चों के हक में काम करते हुए जिस आसमान को छुआ है, उसकी जमीन आर्थिक अभावों और संघर्षों में तैयार हुई है। विदिशा के किले के अंदर क्षेत्र की छोटी हवेली में 14 अक्टूबर 1954 को जन्मे सत्यार्थी 1980 तक यहां रहे। यहीं पढ़ाई की। सामाजिक आंदालनों में भाग लेते रहे। विदिशा में उनका घर आज भी बेहद सामान्य स्थिति में है। स्थानीय स्तर पर बचपन बचाओ आंदोलन का काम उनके भतीजे उमेश शर्मा देखते हैं।

चार भाइयों में सबसे छोटे

बड़े भाई जगमोहन शर्मा बताते हैं कि कैलाश शर्मा हम चारों भाइयों में सबसे छोटे हैं। पिता रामप्रसाद शर्मा पुलिस की नौकरी करते थे और माता चिरोंजीबाई गृहिणी थीं। चारों में सबसे बड़े भाई थे चंद्रभान शर्मा। वे शिक्षा विभाग में थे और डीईओ पद से रिटायर्ड हुए थे। पहले परिवार की पूरी जिम्मेदारी उन पर थी। इसके बाद मेरा नंबर था। मैं माधवगंज में व्यवसाय करता हूं। इसके बाद तीसरे क्रम के भाई नरेंद्र शर्मा हैं जो वर्तमान में शिक्षक हैं। चौथे और सबसे छोटे कैलाश शर्मा अब समाजसेवा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।

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