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राष्ट्रीय क्राफ्ट बाजार में होती है टीकमगढ़ में बनी पीतल की मूर्तियाें की डिमांड

पीतल के कारीगरों को 5 एकड़ जमीन मिलेगी टीकमगढ़ में बनी पीतल की मूर्तियां और सजावट का सामान देश और दुनियां में मशहूर...

Dainik Bhaskar

Aug 07, 2017, 06:05 AM IST
राष्ट्रीय क्राफ्ट बाजार में होती है टीकमगढ़ में बनी पीतल की मूर्तियाें की डिमांड
पीतल के कारीगरों को 5 एकड़ जमीन मिलेगी

टीकमगढ़ में बनी पीतल की मूर्तियां और सजावट का सामान देश और दुनियां में मशहूर है। यहां बनीं मूर्तियों की डिमांड देश भर में लगने वाले राष्ट्रीय क्राफ्ट बाजार में होती है। जिले के कारीगर हर साल दिल्ली, मुंबई, बैंगलौर, सूरजकुंड, कोलकाता सहित अन्य महानगरों में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। मप्र हस्तशिल्प हथकरघा विकास निगम ने इसके लिए कारीगरों से अनुबंध किया है। वे हर साल मेलों का वार्षिक कैलेंडर जारी कर कारीगरों को मूर्तियां बेचने का मौका देते हैं। अपनी प्रतिभा और हुनर के चलते जिले के कई कारीगरों को राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। अब जिला प्रशासन ने मेटल क्राफ्ट हव बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए मूर्तिकारों को जगह उपलब्ध कराई जाएगी।

रामा हैंडीक्राफ्ट के संचालक सुरेंद्र कुमार सोनी ने बताया कि मप्र हथकरघा निगम और मृगनयनी एंपोरियम लघु उद्योग निगम से अनुबंध के चलते सालाना 12-13 लाख रुपए की मूर्तियां और सजावटी सामान की बिक्री हो जाती है। स्थानीय स्तर पर इनकी डिमांड कम है। अगर यहां पर्यटकों का आना शुरू हो जाएगा तो सालाना आय बढ़ जाएगी।

उन्होंने बताया कि वे चौथी पीढ़ि के तौर पर यह काम कर रहे हैं। करीब 65 साल पहले उनके स्वर्गीय दादा भैयालाल सोनी ने टीकमगढ़ में इसकी शुरूआत की थी। पहले पैजना तोड़ा का काम चलता था, जोकि पूरा हाथाें से होता था। अब समय में बदलाव के कारण सांचों से मूर्तियां बनाई जाने लगी हैं। उन्होंने बताया कि बुंदेलखंड क्षेत्र में सबसे ज्यादा बिक्री पीतल के बने घोड़े, हाथी और श्रीकृष्ण अर्जुन रथ की रहती है।

लखनऊ के लिए बनाया था पीतल का गेट

1. युवाओं को दे रहे प्रशिक्षण : बुंदेलखंड बैल मैटल उद्योग, हैंडीक्राफ्ट के नाम से व्यापार कर रहे रमेश कुमार सोनी ने बताया कि शासन के निर्देश पर नई पीढ़ि को यह हुनर सिखाने के लिए युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जिसके तहत 6 माह का प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्होंने बताया कि हाथ की बनी कलाकृतियों की डिमांड ज्यादा रहती है। मूर्तियां बनाने में मेहनत अधिक होती है, इसलिए युवाओं की रुचि इस काम में कम रहती है।

2. मेटल क्राफ्ट हव बनाकर वेबसाइट बनेगी : टीकमगढ़ की अनूठी कारीगरी से बनी मूर्तियां व अन्य सजावटी सामान देश और दुनिया में महज एक क्लिक पर उपलब्ध होगी। पीतल पर अनूठी कारीगरी को जारी रखने के लिए मेटल क्राफ्ट का हब बनाया जाएगा। इसके लिए प्रशासन ने जमीन चिह्नित करने और वेबसाइट बनवाने का निर्णय लिया है। जिले में विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी हाथ से पीलत की मूर्तियां और अन्य सजावटी सामान बनाने की कारीगरी को फिर से नया जीवन दिया जाएगा।

जिला प्रशासन ने टीकमगढ़ में मेटल क्राफ्ट का हब बनाने का निर्णय लिया है। कलेक्टर प्रियंका दास ने जिला उद्योग केन्द्र एवं हस्तशिल्प विकास निगम के साथ मिलकर पूरी कार्ययोजना तैयार की है। इसके लिए छतरपुर रोड पर मामौन के पास पीतल के कारीगरों को 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई जाएगी। इस जमीन पर इन कारीगरों की भट्टी स्थापित करने के साथ ही इन्हें मूर्तियों के निर्माण के लिए स्थान, सेल्स काउंटर, कॉमन हॉल, कांफ्रेंस हॉल सहित अन्य सुविधाएं दी जाएंगी। कारीगरों को आर्थिक मदद मुहैया कराने के लिए प्रशासन द्वारा जिला उद्योग केन्द्र की मदद से विभिन्न योजनाओं के तहत बैंक से लिंक कराया जाएगा।

राष्ट्रपति से सम्मानित

हुए कारीगर

जिले में पीतल का काम करने वाले कारीगरों को राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। पीतल की मूर्तियों का काम करने वाले हरीश सोनी और धनीराम सोनी को राष्ट्रपति ने नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया था। वहीं रामभरोसे सोनी, हरिराम रामकली सोनी, रमेश सोनी, पन्नालाल सोनी, ओमप्रकाश सोनी, कांता सोनी, राकेश सोनी, कुलदीप सोनी, संदीप सोनी एवं सुंदरलाल सोनी भी मुख्यमंत्री के हाथों राज्यस्तरीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। कारीगरों का कहना है कि पहले शासन स्तर से उन्हें बहुत मदद मिलती थी, अब इसमें कटौती होने लगी है। जिससे परेशानी बढ़ गई है।

साल 2012 में पन्नालाल सोनी ने पीतल का गेट बनाया था। करीब 5 फीट ऊंचे और साढ़े तीन फीट चौड़ा पीतल का गेट लखनऊ के ग्राहक की डिमांड पर बनाया गया। रमेश कुमार सोनी ने बताया कि अब ज्यादातर काम वैक्स, माेम प्रोसीजर से होता है। इसके लिए मिट्‌टी का सांचा तैयार कर मोम डाली जाती है। फिर सांचे को आग में गर्म कर मोम को बाहर निकाला जाता है। इसके बाद पीतल को पिघलाकर उसमें भरा जाता है। लंबी प्रक्रिया के बाद मूर्ति बनकर तैयार होती है।

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