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‘माघ की एक उदास दोपहरी में, गेंदे के फूल की हंसी सा बसंत आ रहा है’

5 वर्ष पहले
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’माघ की एक उदास दोपहरी में/ गेंदे के फूल की हंसी सा वसंत आ रहा है।’ रविवार को समकालीन हिंदी कविता के प्रमुख कवियों में शुमार एकांत श्रीवास्तव की कविताओं की ऐसी ही कई पंक्तियां लोगों के मन में देर तक गूंजती रहीं। मौका था प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा का संयुक्त कार्यक्रम श्रुति का, जो एक रचनाकार पर केंद्रित साहित्यिक आयोजन है। इस बार इसमें आधा दर्जन दर्जन से कृतियों के लेखक एकांत श्रीवास्तव का एकल रचना पाठ थ।

दो घंटे तक चले इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने करीब 50 प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ किया। मन, माटी और मानुष का आख्यान सुनाती हुई इन कविताओं के जादुई संसार में लोग मानो पूरी तरह से खोए रहे। उनकी रचनाओं कई पंक्तियां मन में बस सी गईं। मसलन एक कविता में वे कहते हैं - अच्छे दिन खरगोशों की तरह हैं, जो आएंगे हरी दूब में खेलने के लिए। यह दुनिया शीर्षक वाली कविता में वे कहते हैं - यह मन, इस दुनिया में बार-बार टूटता है/ और होता जाता है सख्त / उतना ही जितनी की यह दुनिया है। उनकी कविताओं में गांव के रंग और महक जीवंत हो रहे थे। रंगों और फूलों पर उनकी छोटी कविताओं का समूह अद्भुत था।

कार्यक्रम की शुरूआत दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा सत्यभामा द्वारा बहाव जौनपुरी की गजल के साथ हुई। इससे पहले इप्टा के रंगकर्मियों ने जनगीत प्रस्तुत किए। उनमें अनिल दुबे, विष्णु आदि थे। बीच के अंतराल में समीक्षा ने साहिर लुधियानवी की मशहूर नज्म, वह सुबह कभी तो आएगी, गाकर सुनाई।

कार्यक्रम का संचालन पवित्र सलालपुरिया ने किया। कवि का परिचय प्रलेस अध्यक्ष सत्येंद्र रघुवंशी ने दिया। अंत में आभार इप्टा के संयोजक राम लखन भट्ट ने माना।

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