‘जीवन है चंदन का वन, जैसे कोई सुरभित सुमन’
वसंतोत्सव के परिप्रेक्ष्य में चेतना साहित्य कला परिषद ने की काव्य-गोष्ठी
भास्कर संवाददाता | गुना
चेतना साहित्य एवं कला परिषद ने बसंत पंचमी, सरस्वती जयंती व निराला जयंती पर काव्य-गोष्ठी आयोजित की। जीवाजी पुस्तकालय में गोष्ठी के ठा. धर्मवीर सिंह कुशवाह, विशिष्ट अतिथि पार्षद कवींद्र सिंह चौहान, मप्र लेखक संघ के प्रादेशिक अध्यक्ष डॉ. रामवल्लभाचार्य थे। अध्यक्षता गीतकार विष्णु ‘साथी’ ने की। गोष्ठी की शुरुआत मां सरस्वती, महाप्राण पं. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के चित्र के समक्ष माल्यार्पण व दीप प्रज्ज्वलन कर की गई। सरस्वती वंदना नीलम कुलश्रेष्ठ ने की। परिषद अध्यक्ष देवेंद्र सलिल ने संस्था का परिचय देते हुए काव्य पाठ किया-‘ओ महाप्राण मां सरस्वती के वरद पुत्र, अक्खड़-फक्कड़ वीणापाणि के आराधक, थे नई कविता के तुम अग्रदूत मनमौजी, ओ कालजयी हिंदी के सच्चे साधक।’ कवि सुनील शर्मा ‘चीनी’ ने जीवन की महत्ता निरूपित करते हुए कहा-‘जीवन है चंदन का वन, जैसे कोई सुरभित सुमन।’ शायर डॉ. हरकांत अर्पित ने मौसम के बदलते तेवर पर अपने दिली जज्बात यूं प्रकट किए-‘कहीं सैलाब तो कहीं तूफान मचलते देखे, हमने मौसम के भी अंदाज बदलते देखे। जिस पेड़ के नीचे थी कभी घनी छांव, हमने उस पेड़ को भी आग उगलते देखे।’ कवि- गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए गीतकार विष्णु ‘साथी’ ने यूं कहा-‘मन सुकोमल है विमल है, किंतु यह निर्बल नहीं है, प्यार की शहनाई है ये, दर्द की पायल नहीं है। यह तेरा मॉसल प्रदर्शन।’ गोष्ठी का संचालन कर रहे कवि अनिरुद्ध सिंह सेंगर ने प्रेम का आगाज करते हुए कहा-‘आओ हम तुम गुनगुनाने, कोई राग छेड़े कोई गीत गायें। न बोलो तुम, न बोले हम, सुने सुनाए मन ही मन, धुन कोई ऐसी बजाए।’ कार्यक्रम में श्री सेंगर के रेखाचित्रों की प्रदर्शनी प्रमुख आकर्षण का केंद्र रही। मुख्यअतिथि श्री कुशवाह ने कविता के महत्व को निरूपित करते हुए अपनी बात कही। आभार संस्था अध्यक्ष देवेंद्र सलिल ने माना। इस मौके पर महेन्द्र कुमार जैन, डॉ. श्याम मोहन मिश्रा, धर्मवीर सिंह सहित अन्य श्रोता मौजूद थे।