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आज आतंकी हमले पर प्रश्नों का नहीं, अमरनाथ यात्रियों के साहस की अमरकथा जानने का समय है

4 वर्ष पहले
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पता नहीं महादेव ने पार्वती को अपनी ‘अमर कथा’ सुनाने के लिए हिमालय पर्वत शृंखलाओं की इन ऊंचाइयों और इतनी गहराइयों को चुना था या नहीं - किन्तु आतंकी हत्यारों से निडर अमरनाथ यात्रियों के साहस की अमर कथा, अमर ही रहेगी।

आस्था कुछ भी करवा सकती है। आस्था किसी तथ्य को नहीं जानती। आस्था किसी तर्क को नहीं मानती।

इसलिए आप कह सकते हैं - कि अमरनाथ यात्री आस्था का प्रतीक हैं।

किन्तु मुझे आस्था अथवा शृद्धा दो प्रकार की है, ऐसा लगता है :

पहली, जो अंधविश्वास पैदा करे।

दूसरी, जो दृढ़ विश्वास पैदा करे।

अंतर कैसे स्पष्ट होगा?

- पहले में लक्ष्य नहीं होगा।

- दूसरे में लक्ष्य होगा ही।

अर्थात् पलक झपकते शृद्धालुओं की बस पर हुए आतंकी हमले और हत्याओं के कुछ ही घंटों में हजारों यात्री यदि निडर हो, पूर्ण शक्ति से अमरनाथ की गुफा की ओर बढ़ते हैं- तो लक्ष्य स्पष्ट है।

और इसलिए ऐसा साहस अमर है।

चूंकि कहने को यह उनका लक्ष्य है। वास्तव में तो यह समस्त भारतवासियों का, हम सभी का लक्ष्य है। अमरनाथ दर्शन नहीं - लक्ष्य निडर होना है।

लक्ष्य आतंक को मिटाना है।

लक्ष्य मृत्यु नहीं है।

लक्ष्य मृत्यु सेे निर्भीक होकर, जीवन जीना है।

यही सच्चा साहस है।

एक बार केवल कल्पना कीजिए। स्वयं से जोड़िए। बचपन में साइकल से गिर जाने पर कितने महीनों वापस साइकल चलाने की हिम्मत ही न पड़ी। डूबने जैसा होने पर पानी में फिर कभी उतरे ही नहीं, ऐसा कितने ही भले मित्रों को मैं देखता आया हूं। बड़े होने पर कई उत्साह से भरे लोग मैंने देखे, जो एक बार विफल होने पर, अपने मूल काम, कारोबार या कला से ही हट गए।

परीक्षा में, परिणाम से डर कर, हमारे कितने बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं।

संकट सह सकें, यह गुण हममें सहज नहीं।

तो कल्पना कीजिए, हम एक यात्री बस में बैठे हैं। आतंकियों की धमकी प्रतिदिन सुन रहे हैं। भारी-भरकम सुरक्षा दर्शा रही है कि ख़तरा कितना बड़ा है। एक रक्त-रंजित इतिहास भी सामने है।

किन्तु हम अविचलित हैं। स्वयं पर विश्वास है। बस चला रहे सलीम पर भरोसा है। उसके निकट बैठे हर्ष भाई देसाई से आशा है। उनके साथी मुकेश पटेल से अपेक्षा है। महाराष्ट्र से आए यशवंत भाई का प्रभाव है।

और आतंकी मौत बरसाने आए तो?

बस, यही वो सोच है जो डरा देती है।

वन हू डाउट्स, इज़ डिस्ट्रॉयड। गीता में संशय पालने वाले, भ्रम को दूर न करने वाले और अनिश्चय के साथ, असमंजस में रहने वाले को कठोर चेतावनी दी गई है।

वो जो बस में अमरनाथ यात्री थे, या कि उनमें वे 7 यात्री, जिन्हें पाकिस्तान-पोषित हमले में अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी- वे उतने ही प्रेरक और साहसी हैं/थे/रहेंगे- जितने कि वे हजारों यात्री - जो इस रक्तपात के बाद भी आगे कूच कर गए।

इन्हें भी तो बचपन से आज तक उन सभी संकट-त्रास-समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा। इनमें भी हम जैसे कई होंगे जिन्होंने हर ख़तरे पर उस काम को ही छोड़ दिया होगा, जिसमें ख़तरा दिखा था।

आज वे ही, एकजुट हो आगे बढ़ रहे हैं।

कायर, ख़तरा आने से पहले ही डर जाते हैं।

कमज़ोर, ख़तरा आते ही भयभीत हो जाते हैं।

साहसी, हर ख़तरे का सामना करते हैं।

इन यात्रियों को इस समय कतई चिंता नहीं है कि 40 हजार सैनिकों, सुरक्षा बलों के बलशाली जवानों और सतर्क कश्मीर पुलिस वालों की तैनाती होने पर भी कोई इस्माइल अहमद कहां से घुस गया?

इनमें से किसी ने नहीं पूछा कि गुप्तचर सूचनाएं ठीक समय पर मिलने के पश्चात् भी समस्त उच्चाधिकारी बैठे क्यों रहे?

इनमें िकसी यात्री को यह आश्चर्य नहीं हुआ कि पाकिस्तान के अवैध हड़पे कश्मीर के हिस्से से कोई कैसे यहां, इतनी अंदर तक आ गया? हथियार ले आया?

मोटरसाइकल कहां से आई? किसने इस मौत के अपवित्र काम के लिए दी?

कौन हैं ये ‘लोकल कश्मीरी’ जिनका प्रत्येक हमले के साथ-साथ प्रचार होने लगता है? जो प्रत्येक कानून के रखवाले का स्थायी, रटा-रटाया बहाना बन जाता है? कौन हैं?

इन प्रश्नों को ये यात्री नहीं पूछ रहे। चूंकि उनका मानना है कि जिस प्रकार वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं - उसी प्रकार सभी सरकार-राजनीतिक दल और अफ़सर- अपना-अपना कर्तव्य निभा ही रहे होंगे।

प्रश्न तो अनंत हैं।

वह बस, अमरनाथ यात्रा के लिए रजिस्टर्ड नहीं थी। सुरक्षा बलों ने स्पष्टीकरण दिया इसलिए उस बस को सुरक्षा उपलब्ध नहीं थी।

क्या कागज़ी कार्रवाइयों की दास है सुरक्षा?

क्या कश्मीर में ‘इन्हें सुरक्षा देंगे’ और ‘उन्हें नहीं’ ऐसा है?

हो ही नहीं सकता।

हमारा कानून तो दुर्दांत अपराधियों तक को खरोंच तक नहीं आने देता - तो इन निर्दोष शृद्धालुओं को कैसे सुरक्षा नहीं मिली?

प्रश्न तो यह भी है कि रजिस्ट्रेशन बिना एक बस 40 से अधिक यात्रियों से भरी दौड़ रही है - तो किसी ने रोक कर पूछा क्यों नहीं?

टायर पंक्चर हुआ, देर तक जुड़वाते रहे - किसी ने जांचा क्यों नहीं?

सेना की रोड ओपनिंग पार्टी -जो यात्रियों को सुरक्षित मार्ग देती है- साढ़े छह बजे तक अपना काम समाप्त कर देती हैं।

कान पक गए यह सुनते-पढ़ते कि बस ने उल्लंघन किया। उक्त तय समय के बाद निकले।

क्या कश्मीर में साढ़े छह बजे बाद सुरक्षा बंद कर दी जाती है?

क्या विश्व में कहीं भी, सुरक्षा के समय-घंटे तय होते हैं?

‘उल्लंघन-उल्लंघन’ तो इतना प्रचारित किया जा रहा है कि मानो यात्रियों का दोष हो -आतंकियों का नहीं।

बंद होने चाहिए ऐसे झूठे शोर।

अन्यथा मूल प्रश्न फिर सिर पर खड़ा हो जाएगा कि आतंकी आ कैसे गए?

उल्लंघन होने/करने किसने दिया?

इसी तरह एक कर्कश शोर राजनीतिक दल भी मचा रहे हैं। अनेक प्रकार के दैत्याकार धक्के पहुंचा रहे हैं। ये दोषी। वो दोषी।

हमारे यात्रियों के बलिदान और साहस की गर्जना ही होनी चाहिए। हमें वही सुननी चाहिए। शेष सब शोर व्यर्थ।

आरम्भ में ये और अनेक प्रश्न मेरे मन में भी आए।

किन्तु यात्रियों के साहस के समक्ष ये समस्त प्रश्न, हल्के लगने लगे।

फिर, यह विचार भी आया कि वो जो सुरक्षा बलों के जवान हैं - उनका भी तो साहस है। आज की डरावनी स्थिति में - इतने बड़े ख़तरे कोई क्यों उठाएगा?

सेना, अर्धसैनिक बल सभी सहज ही कह सकते थे कि ऐसे वातावरण में यात्रा स्थगित करना ही उचित होगा।

और हम सभी यह तर्क मान भी लेते। किन्तु उन्होंने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ा।

करेज लीड्स टू इम्मोर्टेलिटी, फीअर लीड्स टू डेथ।

कितना साहसपूर्ण वाक्य है यह।

दोनों स्थितियों में जीवन नहीं बचा।

किन्तु कितना विशाल अंतर है।

साहस से अमर होंगे। भय से मृत।

हम प्रत्येक अवस्था में साहसी रहें, असंभव है। किन्तु रहना ही होगा। चूंकि आप जितना साहसी स्वयं को मानते हैं - उससे कई-कई गुना अधिक साहसी आप हैं। केवल मानने की आवश्यकता है।

बड़े से बड़ा संकट या निर्दय से निर्दय मृत्यु से कहीं अधिक बड़ा होता है - इनका डर।

इसलिए संसार का सर्वाधिक सुंदर शब्द है : निडर।

इसीलिए मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।

दृढ़तापूर्वक बढ़ते जा रहे अमरनाथ यात्रियों ने सिद्ध कर दिया है - भक्त, भगवान से बड़ा होता है।

(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एिडटर हैं।)

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