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‘नरवर चढ़े ने बेड़नी,

3 वर्ष पहले
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1 वर्ष 1486 से 1515 तक राजा मानसिंह तोमर का काल माना जाता है। ऐसा बताया जाता है कि राजा मानसिंह तोमर नरवर दुर्ग में भी रहे थे। गुर्जर पुत्री मृगनयनी से मेल मुलाकात एवं प्रणय-प्रेम इसी दुर्ग में रहते एवं ग्वालियर आते-जाते हुआ था। यह किला अनेक प्रणय-लीलाएं छिपाए हुए हैं। इस प्रेमकथा से नरवर का संबंध भी इतिहासकार बताते हैं। राजस्थान की प्रसिद्ध प्रेमकथा ढोला-माऊ का नायक ढोला नरवर के नरेश का पुत्र बताया गया है। यहां पर नल-दमयंती की प्रणय-लीला का उल्लेख बताया जाता है।


‘नरवर चढ़े ने बेड़नी, एरछ पकै न ईंट....: शिवपुरी जिले की इस तहसील में एक कहावत आज भी प्रसिद्ध है-‘नरवर चढ़े ने बेड़नी, एरछ पकै न ईंट-गुदनौटा भोजन नहीं, बूंदी छपै न छींट’। बताया जाता है कि नरवर दुर्ग के दक्षिणी दरवाजे के पास किला पहाड़ की तलहटी में एक छोटे चबूतरे पर मढ़िया बनी हुई है, जिसे लोहड़ी देवी का मंदिर कहा जाता है। लोहड़ी देवी एक तांत्रिक नटिनी थी। वह ग्वालियर की रहने वाली थीं। नरवरगढ़ जब अपने वैभव और शिखर पर था, उस वक्त लोहड़ी नटिनी नरवर दुर्ग में पहुंची। उन्होंने कछवाह राजा से कच्चे धागे पर चलने का कलात्मक प्रदर्शन एवं दक्षता प्रदर्शन देखने का आग्रह किया। राजा से लोहड़ी नटिनी ने कच्चे सूत पर चलकर दिखाने की बात कही। उसके एवज में महाराजा से पुरस्कार मांगा। महाराजा ने कहा कि यदि ऐसा हुआ, तो नरवर का राज्य दे दूंगा। कच्चे धागे पर चलने से पहले नटिनी ने राजा के सभी हथियारों को अभिमंत्रित कर दिया। उसके बाद उसने कच्चे धागे पर चलना शुरू किया। परेशान मंत्री ने एक चर्मकार से रांपी मंगवाकर रख ली थी। जैसे ही नटिनी बुर्ज के पास आने को थी। मंत्री ने रांपी से धागा काट दिया और नटिनी नीचे गिरकर मर गई। उसी स्थल पर लोहड़ी देवी का मंदिर है। इस मंदिर में मूर्ति नहीं है, केवल होम धूप की पूजा की जाती है।

महाभारत कालीन है नरवर का विशाल दुर्ग
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