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कबाड़ के पाइप से बनाई स्टूडेंंट्स के लिए सीढ़ी

5 वर्ष पहले
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बात वर्ष 2009 की है, जब मेरा ट्रांसफर ग्वालियर के केंद्रीय विद्यालय-क्रमांक 1 में हुआ। उस समय स्कूल और ग्वालियर दोनों ही मेरे लिए नए थे। इसलिए ज्यादातर समय स्टूडेंट्स के साथ बिताता या फिर खाली समय स्कूल कैंपस में गुजरता। करीब एक वर्ष स्टूडेंट्स को पढ़ाने और उनकी प्रॉब्लम जानने में मैंने गुजार दिया। जब स्कूल की छुटि्टयां हुईं तो देखा कि स्कूल कैंपस का पिछला हिस्सा टूटी टेबल, पुराने पाइप, लकड़ी के टूटे गेट और चटकी हुईं टीनशेट से भरा है। जब भी इसे देखता मन में अलग-अलग विचार आते। चूकि स्टूडेंट्स को मैं क्लासरूम में हमेशा इनोवेशन की शिक्षा देता था, कई बार वो भी मुझसे पूछते, सर आप ही कोई अपना अनुभव सुनाएं। स्टूडेंट्स की यह बात मेरे मन में इस कदर चुभ गई कि लगने लगा कि अब कुछ ऐसा करना है, जो मेरे लिए नहीं बल्कि सभी के लिए आदर्श बन जाए। वर्ष 2015 में ग्वालियर में स्पोर्ट्स मीट होना तय हुई। हमारे केंद्रीय विद्यालय क्रमांक-1 को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। उस समय हमारे पास दो सबसे बड़ी चुनौतियां थी कि कम समय और कम बजट में स्कूल में निर्माण कार्य कैसे कराए जाएं। प्रिंंसिपल राजकुमारी निगम ने सभी से सजेशन मांगे, उनमें से मैं भी एक था। मैंने उनसे स्कूल के कबाड़ काे रियूज करने की सलाह दी। प्रिंसिपल के हामी भरते ही मैं काम में जुट गया। चूकि मैंने इंजीनियरिंग की थी, इसलिए उसका लाभ मुझे इसमें मिल गया।

स्कूल के लिए रेलिंग तैयार कराते शिक्षक राकेश इंदुलकर। दूसरे चित्र में सीढ़ियों में लगी कबाड़ से तैयार रेलिंग।

केवी ने पत्र लिखकर अन्य टीचर को भी राकेश इंदुलकर के कार्य से प्रेरणा लेने को कहा -

Áपुराने सरियों से सीढ़ियां बनाई।

Áस्टूडेंट्स की सुरक्षा के लिए सीढ़ियां और खुले स्थान पर रेलिंग भी बनाई।

Áपुराने टीनशेड को स्कूल की बाउंड्रीवाल बनाने में उपयोग किया।

Áपुराने एंगल से गार्ड रूम में बनाई बंदूक रखने के लिए अलमारी।

Á पुराने गेट और टीनशेड से छह टॉयलेट भी बनाए।

Áटूटी जालियों से स्कूल में लगे वाटर कूलर को सुरक्षित रखने के लिए फ्रैमिंग की।

भास्कर ख़ास
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