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टीएंडसीपी और नगर निगम ने निरस्त कर दी थीं सारी अनुमतियां

4 वर्ष पहले
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सीधी बात प्रदीप वर्मा, भवन अधिकारी नगर निगम
 75 बीघा की ग्रीन साउथ एवेन्यू को क्या आपने कंप्लीशन सर्टिफिकेट दिया है?

 आपने पहले भी पूछा था। मैंने फाइल देखी है। फाइल में कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं है और न ही कोई नोटशीट चली।

 फिर आप इस कॉलोनी में भवन निर्माण की अनुमतियां कैसे जारी कर रहे हैं?

 मैंने कोई अनुमति जारी नहीं की। एक प्रकरण आया था, तो मैंने निरस्त कर दिया। जिसका प्रकरण निरस्त किया था, वो आधे घंटे में कंप्लीशन सर्टिफिकेट ले लाया, लेकिन हमने चेक किया, तो हमारी फाइल में ये नहीं है और न ही इसकी कोई प्रक्रिया है। कुछ न कुछ तो गड़बड़़ी हुई है।

 लेकिन अनुमतियां तो जारी हुई हैं?

 मेरे कार्यकाल में नहीं हुआ। पहले क्या हुआ, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है।

 क्या इसमें करोड़ों की रिश्वत का खेल है?

 मैं इस मामले को आयुक्त के संज्ञान में लाऊंगा। गड़बड़ी तो है, लेकिन मैं इस बारे में कहने के लिए अधिकृत नहीं हूं।

 क्या गड़बड़ी हैं, बिल्डर का कहना है कि उसके पास सभी अनुमतियां हैं?

 हम बिल्डर की बात नहीं कर रहे हैं। हम अपने कार्यालय में हुई गड़बड़ी तलाश रहे हैं। मैंने ड्रॉइंग सेक्शन से जानकारी मांगी थी। मानचित्रकार ने बताया कि बंधन मुक्त होना रिकॉर्ड में नहीं है। उसने कॉलोनाइजर से जानकारी मांगी, तो उसने निगम कार्यालय में बंधन मुक्ति का पत्र भिजवाया।

 वर्ष 2012 से 2016 तक कोर्ट का स्टे था। तब क्या प्लॉट बंधन मुक्त कर सकते हैं?

 कोर्ट के स्टे के दौरान किसी प्रकार की कार्रवाई संभव नहीं है। फिर बंधन मुक्त तो कर ही नहीं सकते।

हमारे पास सारे दस्तावेज हैं
मेरी जानकारी में वर्ष 2014 से पहले ही फैसला हुआ था। हमारे पास सारे दस्तावेज हैं। उसके बाद हमने प्लॉट बेचना शुरू किया। उसका ऑर्डर आरडी गुप्ता के पास ही है। राजेंद्र सचेती, पार्टनर न्यूट्रिक डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड

ऐसे होती है जमीन मुक्त

निगम द्वारा जब भी बंधन की गई जमीन मुक्त की जाती है। उससे पहले नगर निगम कमिश्नर निरीक्षण करते हैं। साथ उसके बाद एक नोटशीट लिखकर देते हैं। उसका मुख्य कारण है कि नगर निगम आयुक्त को ही विकास अनुज्ञा जारी करने एवं कालोनी हस्तांतरण लेने के अधिकार प्राप्त हैं। इसी वजह से निगमायु्क्त ही नोटशीट होना जरूरी है। लेकिन उसमें आयुक्त की नोटशीट ही नहीं है।

जांच के बाद लेंगे एक्शन
जिस कॉलोनी की अनुमति के बारे में कोर्ट के आदेश की बात कह रहे हैं, वह मैं कागज देखकर ही बता पाऊंगा कि उसमें क्या आदेश है और क्या समय-सीमा। दस्तावेज आप मुझे भेज दें। मलय श्रीवास्तव, प्रमुख सचिव नगरीय विकास एवं आवास

भोपाल सीईओ को गंवानी पड़ी थी जान
भोपाल की हजूर तहसील से लेकर अन्य स्थानों का हजारों एकड़ जमीन स्कीम में फंसी थी। वर्ष 2009 में वहां के नेताओं ने भोपाल विकास प्राधिकरण के तत्कालीन सीईओ एमजी रूसिया पर स्कीम से मुक्त करने के लिए दबाव डाला। 09 नवंबर 2009 को यात्रा के दौरान उनकी संदिग्ध हालत में ट्रेन से गिरकर मौत हो गई। सीईओ रूसिया का शव आगरा के नजदीक रेलवे पटरी पर गिरा मिला था। इनके साथ भाजपा विधायक जीतेंद्र डागा यात्रा कर रहे थे, उनकी जमीनें भी स्कीम में फंसी थीं। उन पर हत्या के आरोप भी लगे, हालांकि साबित कुछ नहीं हुआ। सब संदेह का लाभ पाकर बरी हो गई। इंदौर व जबलपुर में स्कीम की भूमियां मुक्त नहीं हो पाईं।

बंधन मुक्ति के पीछे का यह है असली खेल
किसी संस्था या सोसायटी द्वारा कॉलोनी विकसित करने से पहले नगर निगम से अनुमति लेनी होती है। अनुमति जारी होने की दिनांक से तीन वर्ष के अंदर उसे कॉलोनी डेवलप करनी होती है। इस बीच जिस संस्था ने अनुमति ली है, वह दो बार एक-एक वर्ष का एक्सटेंशन ले सकता है। मतलब पांच वर्ष में उसको कॉलोनी का विकास कर जमीन को निगम से बंधन मुक्त कराना होता है। अगर पांच साल के अंदर विकास नहीं करता है, तो उसे नए सिरे से पूरी प्रक्रिया करनी पडड़ती है। बिल्डर को इससे बचाने के लिए सिटी प्लानर ने जमीन को बंधन मुक्त करा लिया, जबकि कोर्ट का स्टे होने के कारण उसे बंधन मुक्त नहीं किया जा सकता।

बिल्डर के मित्र अफसर
आवास एवं पर्यावरण विभाग के स्कीम की भूमि पर जीडीए द्वारा दी गई एनओसी निरस्त करने के आदेश दिनांक 18-12-2012 के खिलाफ न्यूट्रिक बिल्डर ने वर्ष 2012 में उच्च न्यायालय में पिटीशन दायर की। न्यायालय ने आवास एवं पर्यावरण विभाग का आदेश इस वजह से निरस्त कर दिया कि संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।

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