सिटी रिपोर्टर
सिटी रिपोर्टर बसंत के आगाज से पहले साहित्य और उर्दू अदब के कुछ फूल हमें छोड़ गए हैं। इनमें प्रख्यात शायर निदा फाजली और साहित्यकार डॉ. पूनमचंद तिवारी शामिल हैं। शहर के साहित्य जगत से जुड़े लोगों ने बसंत पर इन दोनों हस्तियों पर समर्पित रचनाएं लिखी हैं।
-अब के बहार जैसे फिजा साथ लाई है, पूनम नहीं है साथ निदा भी चले गए। आंगन में धूप-छांव के मंजर बदल गए, एक साख और सूख गई हर श्रृंगार की।
अतुल अजनबी
-हां, बदलते ही गए हालात, लेकिन हाथ से छूटा नहीं है हाथ। यूं कहानी तो मुकम्मल हो गई है, कुछ अधूरी लग रही है बात। ढूंढने निकली थी खुशबू को हवाएं, लौटकर आईं हैं, खाली हाथ। फिर बसंती रुत ने दस्तक दी सबा, छूटता जाता है किसका साथ।
-रश्मि सबा
-मन वैरागी हो गया जीवन साधु संत, हमको एक समान हैं पतझड़ और बसंत। पतझड़ पूजा जा रहा, रोती फिरे बहार, डोली खुद ही लूटते अब तो यहां कहार। हर ओर लगे हैं पहरे बसंत में, कुछ लोग हो गए हैं बहरे बसंत में।- साजन ग्वालियरी
सरसों के खेतों में, सतरंगी रेतो में, बरगद पे, बेंतों में। पीपल की शाखों पे, पंछी के पाखों पे, छाया बसंत है। गोरी के गालों में, जूड़े में, बालो में। -शिराली रूनवाल
- निकले थे हम एक राह पर, अपनी गजल बनाने के लिए। नफरत की दुनिया को, प्रेम दिखाने के लिए। फूलों पर बैठी तितलियों से भी मेरा दामन हो गया, जो देख उनकी सुंदरता अपनी सुधबुध खो गया।
नीलम राजपूत
निदा फाजली और पूनमचंद तिवारी के लिए साहित्यकारों ने लिखीं पंक्तियां
अब के बहार जैसे फिजा साथ लाई है पूनम नहीं साथ, निदा भी चले गए
sahityakar tribute