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तब रेल डिब्बे में होती थी साहित्य पर चर्चा

5 वर्ष पहले
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पुराने समय में रेल में बैठने वाले अपने आपको दूसराें से अलग समझा करते थे। इनमें से कुछ तो स्वयं को देवराज से थोड़ा भी कम नहीं आंकते थे। तब रेल के डिब्बे में साहित्य पर परिचर्चा होती थी। इसलिए उस समय रेल का डिब्बा ग्वालियर के साहित्यिक-देवलोक की शान थे, उसकी पहचान थे, जो देशभर में जाने जाते थे। नाम तो अनेक हैं किंतु कुछ नाम लिए बिना यह कहानी ही अधूरी रह जाएगी। वीरेंद्र मिश्र, देवेंद्र नारायण वर्मा, रामकुमार चतुर्वेदी, मुकुट बिहारी सरोज, कुंज बिहारी व्यास, महेंद्र मुकुल, मोहन अंबर आदि। निर्विवाद सर्व स्वीकृत इंद्र तो एक ही थे शांति स्वरूप चाचा, जिनका नारा था प्यार करो डंके की चोट, वो यारी क्या मक्कारी है, जो होती परदे की ओट। समवेत स्वरों में सबको उद्घोष था- तुम सुरपुर का मुकुट मुझे मत पहनाओ, मैं तो कवि हूं अपने घर का राजा हूं। काश वह डिब्बा कहीं मिल पाता, तो यह सभी नाम चेहरे पढ़े देखे जा सकते। आज के भारत र| कविवर अटल जी कभी उस जादुई डिब्बे में सवार हुए या नहीं, अब यह याद नहीं...कहना मुश्किल है। यहां से जब गोरखी के पीछे की ओर चलते हैं, तो पानी की टंकी के पास-एक साहित्यिक तीर्थ हुआ करता था, विट्ठल मंदिर...इस तीर्थ की रोचक कथा, हम आगामी सप्ताह आपको सुनाएंगे।

इस कॉलम के माध्यम से करीब 75 वर्ष से शहर को देखते आ रहे शैवाल सत्यार्थी बता रहे हैं शहर की यादों से जुड़े किस्से

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