ग्वालियर। मान सिंह का 1940-55 तक ऐसा आतंक था कि उनके खात्मे का जिम्मा गोरखा रेजीमेंट की टुकड़ी को सौंपा गया था। मारे गए डाकू का सम्मान भी इतना था कि खेड़ा राठौर में गांव वालों ने इस ड़ाकू को देवता मानकर मंदिर बनवाया है। पीड़ितों को इंसाफ दिलाने बन गए डाकू...
चंबल के डकैतों का आतंक सदियों से रहा है। dainikbhaskar.com इतिहास के इन्हीं पहलुओं को उजागर करते हुए सामने ला रहा है।
चंबल में 1940 के आसपास वह दौर भी आया था, जब कई जागीरदार-जमींदार डाकू बने। इनमें सबसे पहला नाम डाकू मानसिंह का आता है। मान सिंह के डकैत बनने के पीछे कोई गरीबी और उत्पीड़न जैसी कहानी नहीं रही, बल्कि मानसिंह वह जमींदार था, उसके पास खुद की करीब 900 बीघा खेती हुआ करती थी। पहली बार उन्होंने एक पीड़ित की गुहार पर उसकी जमीन पर कब्जा कर लेने वाले साहूकार के खिलाफ पंचायत बिठाई। यहां न्याय दिलाने पर विवाद छिड़ा और मान सिंह ने नाइंसाफी कर रहे साहूकार को उसके सहयोगियों समेत गोली मार दी थी।
गिरफ्तार भी हुए थे मान सिंह
मान सिंह गिरफ्तार हुए, 13 साल की सजा भी भुगती। इस दौरान उनकी सारी जमीन उसी साहूकार के परिवार ने हड़प ली। बाहर आए तो अपनी जमीन पर हक की लड़ाई शुरू की, इंसाफ नहीं मिला, साथ ही कई और सताए हुए लोगों ने भी उनसे इंसाफ के लिए आग्रह किया। मजबूरी में मान सिंह को चंबल के बीहड़ों में शरण लेनी पड़ी।
इंसाफ की लड़ाई के लिए बनाया डकैत गिरोह
मान सिंह ने 17 डाकुओं के साथ मिलकर एक गिरोह बनाया, जिसमें अधिकतर उनके भाई और भतीजे शामिल थे। महिलाओं की इज्जत करना तो उनके दल का सबसे पहला कर्तव्य था। वे उन पर आंच नहीं आने देते थे। बलात्कार का सिर्फ आरोप लगा तो उन्होंने गैंग के एक महत्वपूर्ण सदस्य सुल्तान सिंह तोमर उर्फ सुल्ताना को बाहर का रास्ता दिखा दिया था।
कमजोर को नहीं सताया मान सिंह ने
उनके करीबी बताते हैं कि कमजोर लोगों को मान सिंह के गिरोह ने कभी अपना शिकार नहीं बनाया। मजबूर और कमजोर लोगों को हक दिलाने के लिए वे खूनी खेल जरूर खेलते थे। उनके नाम लूट की 1,112 तथा हत्या के 185 मामले दर्ज थे। लेकिन उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी महिला का अपहरण नहीं किया और ना ही किसी बच्चे की हत्या की।
आगे की स्लाइड में, पहला डकैत जिसे मारने लगाई गई गोरखा रेजीमेंट..