ग्वालियर. डॉ. हरिंदर जसेजा, ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर। मिर्गी का इलाज खोजना चाहते थे। शासकीय सेवा में रहते हुए रिसर्च नहीं कर पा रहे हैं, तो नौकरी से वीआरएस ले लिया।
18 साल की कोशिश के बाद डॉ. जसेजा ने पीपीएन स्टिमुलेशन पद्धति की खोज की। डॉ. जसेजा ने अपनी इस नई पद्धति को अमेरिका में पेटेंट कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और मिर्गी के इलाज की दवा तैयार करने में जुट गए हैं। 14 से 16 मार्च तक लंदन में होने वाली अंतरराष्ट्रीय वर्कशॉप में डॉ. जसेजा को नई पद्धति को प्रजेंट करने के लिए आमंत्रित किया गया है।
अब तक डॉ. जसेजा के 85 रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो चुके हैं।
डॉ. जसेजा बताते हैं, “मिर्गी की बीमारी से मानव जाति करीब तीन हजार साल से पीड़ित है। अक्टूबर 2014 में इंटरनेशनल लीग अगेंस्ट एपिलेप्सी (आईएलएई) की बैठक में इसकी परिभाषा तय हो पाई। बहुत साल लग गए इसमें। मैं बनना तो साइंटिस्ट चाहता था, लेकिन माता-पिता के कहने पर डॉक्टर बन गया। मुझे वैज्ञानिक बनने की जिद मुझे उकसाती रहती थी।’ क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर से ईईजी की ट्रेनिंग लेने के बाद डॉ. जसेजा को लगा कि मिर्गी के क्षेत्र में अभी बहुत काम होना बाकी है।
डॉ. जसेजा कहते हैं कि बस मुझे वैज्ञानिक बनने का मौका मिल गया। मैंने मिर्गी के इलाज की खोज शुरू कर दी। डॉ. जसेजा की नई पद्धति में एक नया टारगेट पेंडुक्युलो-पोंटाइन-न्यूक्लियस (पीपीएन) बनाया जाता है। इसके लिए कॉलर-बोन के नीचे चेस्ट रीजन में एक पल्स-जनरेटर इंप्लांट किया जाएगा। ये रोगी के दिमाग में पहले से इम्प्लांटेड इलेक्ट्रोड से जुड़ा रहेगा। डॉ. जसेजा ने बताया कि इन दोनों के बीच बिजली तरंग का फ्लो किया जाएगा। जो रोगी में मिर्गी के दौरे को रोक देगा।
मिर्गी के रोगियों का एेसे होता है इलाज
अभी 70 प्रतिशत मिर्गी के मरीज दवा का सेवन करते हैं। दवा के नियमित सेवन से यह बीमारी नियंत्रण में रहती है। 30 प्रतिशत मरीज ऐसे होते हैं जिनमें दवा कारगर नहीं रहती है ऐसे मरीजों के दिमाग का ऑपरेशन, वीएनएस, डीवीएस से इलाज किया जाता है। लेकिन ये पद्धतियां पूरी तरह नहीं कारगर है।
नई पद्धति का फायदा
मिर्गी रोग करीब 50 प्रकार का होता है। नई पद्धति में पीपीएन में स्टिमुलेशन से आरईएम निद्रा अवस्था का संचालन एवं नियंत्रण होता है। इसी पीपीएन को स्टीमुलेट करके आरईएम निद्रा अवस्था की मात्रा को नियंत्रित करके मिर्गी के दौरा एवं उसकी प्रक्रिया पर नियंत्रण किया जा सकेगा। यह नई पद्धति वर्तमान में उपलब्ध थैलेमिक डीबीएस की अपेक्षा कुदरती तरीके से मिर्गी के खिलाफ सुरक्षा एवं नियंत्रण प्रदान करेगी। साथ ही मनुष्य के शरीर में अन्य न्यूरो सर्जीकल इंटरवैन्शन से उत्पन्न दुष्प्रभाव से भी मुक्त रखेगी।
कोई साइड इफैक्ट नहीं
इस पद्धति में कोई भी साइडइफैक्ट नहीं है, क्योंकि यह कुदरती तरीके से काम करेगी। सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हर प्रकार के मिर्गी रोग का इलाज कर सकेगी। यह पद्धति तैयार है अब सिर्फ इसका क्लीनिकल ट्रायल बाकी रह गया है। पेटेंट होने के बाद इसका ट्रायल शुरू किया जा सकेगा।