ग्वालियर। ग्वालियर के महाराजा जनकोजीराव सिंधिया की 1843 में जब मृत्यु हुई तब इनकी विधवा रानी तारा बाई की उम्र महज 14 साल थी। ईस्ट इंडिया कंपनी का तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड एलिनवरो ऐसे ही किसी मौके की तलाश में था कि सिंधिया राजा नि: संतान मरे, और वह ग्वालियर रियासत को हड़प ले। उसकी इस मंशा पर राजभक्त सरदार संभाजी राव आंग्रे ने पानी फेर दिया। सरदार आंग्रे ने जनकोजी राव के मरने की खबर फैलने से पहले ही सरदार हनुमंत राव के बेटे को गोद लिया घोषित करवा दिया, और 8 साल का भागीरथ राव जयाजीराव के नाम से महाराज बना दिया गया। कंचे खेलने में अच्छा निशाना और रणनीतिक सूझबूझ देख बना दिया महाराज....
महाराजा जनकोजी राव सिंधिया 1843 में बहुत कम उम्र में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। उस वक्त उनकी विधवा रानी तारा बाई किशोरी ही थी, उनके कोई संतान नहीं थी। सिंधिया रियासत को बचाने के लिए जरूरी था कि जनकोजी का कोई वारिस हो। लिहाजा उनके मरणासन्न होते ही, खबर फैलने से पहले, सिंधिया रियासत के वफादार सरदार संभाजी राव आंग्रे घोड़े पर सवार हुए, और वहां जा पहुंचे, जहां रियासत के सरदारों के बच्चे खेल रहे थे। खेल कंचों का हो रहा था। सरदार आंग्रे ने देखा कि सरदार हनुमंत राव सिंधिया के बेटे भागीरथ राव का न सिर्फ निशाना अचूक था, साथ ही वह रणनीति बना कर खेल रहा था। भागीरथ की समझबूझ देख सरदार आंग्रे ने उसे घोड़े पर बिठाया और तत्काल मरणासन्न जनकोजी के पास ले जाकर, उसे उनका गोद लिया वारिस घोषित करवा दिया। भागीरथ राव जब तक यह समझ पाता कि सरदार आंग्रे उसे क्यों अचानक खेल से उठा कर ले आए हैं, वह महाराज बन चुका था। उसका नाया नाम रखा गया जयाजीराव सिंधिया। वह जनकोजी राव की 14 साल की विधवा ताराबाई का बेटा बन कर महाराजा जयाजी राव सिंधिया बन गया।
सिंधिया राजवंश के शासक जयाजीराव कि ग्वाालियर के महाराज बाड़े पर प्रतिमा स्थापना के 100 पूरे हो रहे हैं, इस मौके पर dainikbhaskar.com पेश कर रहा है उनके राजा बनने की रोचक कहानी....
28 साल बाद मिला जयाजी राव को महाराजा का अधिकार
सरदार आंग्रे की राज भक्ति और सूझबूझ से सिंधिया राजवंश को वारिस तो मिल गया, लेकिन जयाजी राव को महाराजा के सारे अधिकार 28 साल बाद 1885 में ही मिल सके। 8 साल का राजा और 14 साल की राजमाता को सत्ता-सूत्र सौंपने से कंपनी सरकार ने मना कर दिया, और अपने एजेंट दिनकर राद राजवाड़े को दोनों का रीजेंट बना दिया। इसी दौरान 1857 के संघर्ष का केंद्र बिंदु भी ग्वालियर ही बन गया। इस विद्रोह को समाप्त होने के बाद जब जयाजी राव युवा से प्रौढ़ हो गए तब कड़ी मशक्कत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1885 उन्हें महाराजा के अधिकार सौंपे, और इससे पहले 1857 से अब तक के सैनिक नुकसानों की भरपाई के लिए 15 लाख रुपए भी वसूल किए, तब जयाजी राव को महाराजा माना।
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