ग्वालियर। पिता की हत्या का बदला लेने चंबल के बीहड़ों में कूदे डोंगर सिंह और उनके भाई बटुरी सिंह का गिरोह चंबल का पहला संगठित गिरोह माना जाता है। तत्कालीन महाराजा माधवराव सिंधिया के खजाने तक को लूट लेने वाले इस गिरोह ने इन्हीं महाराज के सामने 1920 में समर्पण कर दिया था।
चंबल के डकैतों का आतंक सदियों से रहा है। dainikbhaskar.com इतिहास के इन्हीं पहलुओं को उजागर करते हुए सामने ला रहा है। महाराजा माधवराव सिंधिया द्वितीय के काल में हुए डोंगर-बटुरी ने उन महाराज के खजाने को भी कई बार लूटा, जिनका वो सम्मान करते थे।
सिंधिया का खजाना लूट बढ़ाई ताकत
डोंगर-बटुरी गैंग चंबल का पहला व्यवस्थित गैंग था। शुरुआती दौर में ये जंगल से गुजर रहे ऊंटों और घोडों और बैलगाड़ियों के काफिलों को लूट लिया करते थे। आतंक बढ़ा तो दुश्मन भी बढ़े, लिहाजा सुरक्षा बढ़ाने के लिए उन्होंने गिरोह का आकार भी बढ़ाया। उन दिनों गैंग घोड़ों पर चलती थी, लिहाजा खर्च भी बढ़ा, तो सिंधिया महाराजा का रिवेन्यू लेकर जाने वाली टुकड़ियों को लूटना शुरू कर दिया।
राजस्थान के एक ब्रिटिश पुलिस अफसर का किया अपहरण
डोंगर बटुरी के आतंक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होने रास्ते में मिली ब्रिटिश पुलिस की ट्कड़ी से उनकी सुरक्षा में गुजर रहे DIG रैंक के अफसर का अपहरण कर लिया। उसे बीहड़ों में रखा और बगैर फिरौती लिए छोड़ दिया। डोंगर सिंह ने ये सिर्फ इसलिए किया कि अंग्रेज भी जान जाएं कि चंबल के बागी क्या हैं।
महाराजा माधवराव सिंधिया के सामने किया समर्पण
डोंगर-बटुरी ने भले कई बार माधवराव सिंधिया का रिवेन्यू लूटा था, लेकिन महाराज का सम्मान बहुत करते थे। जब ब्रिटिश अफसर का अपहरण करने के बाद उनका खौफ ब्रिटिश कंपनी सरकार तक पहुंचा तो महाराजा माधवराव पर गिरोह के खात्मे का दबाव बढ़ा। सिंधिया सेना ने घेराबंदी शुरू कर दी, लेकिन चंबल के सैकड़ों फीट गहरे भरकों में डोंगर-बटुरी को तलाश न पाई। आखिरकार मध्यस्थों के जरिए डोंगर-बटुरी तक महाराज का संदेश भिजवाया गया कि यह उनकी इज्जत का सवाल है। संदेश में वचन दिया गया था कि डोंगर-बटुरी के गिरोह को समर्पण के बाद कठोर सजा नहीं दी जाएगी। तब आखिरकार इस गिरोह ने 1920 में महाराजा माधवराव से सामने समर्पण कर दिया।
सीरीज में हम आगे बताएंगे ‘चंबल के जागीरदार-जमींदर भी बागी होकर बने डाकू’....
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