ग्वालियर। पान सिंह तोमर सेना में भर्ती हुए और रेस में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। रिटायर होकर वह गांव लौटा, तो जमीन पर चचेरे भाई ने कब्जा कर लिया था। प्रताड़ना से तंग आकर आखिरकार डाकू बन गया। दो साल के आतंक का खात्मा अक्टूबर 1981 में 13 घंटे चली मुठभेड़ के बाद हुआ। ऐसे बना डाकू...
चंबल के डकैतों का आतंक सदियों से रहा है। dainikbhaskar.com इतिहास के इन्हीं पहलुओं को उजागर करते हुए सामने ला रहा है।
सीधे-सादे सूबेदार पान सिंह जब फौज छोड़ कर अपने गांव आया, तो जमीन पर चचेरे भाइयों ने कब्जा कर लिया था। पान सिंह पुलिस में रिपोर्ट लिखाने गया, लेकिन पुलिस ने कोई मदद नहीं की। चचेरे भाइयों की प्रताड़ना का दौर जारी रहा, तो पान सिंह बागी होकर डकैत बन गए, चचेरे भाई बाबू सिंह की हत्या कर दी।
CM को चुनौती दी तो पान सिंह को मारने सरकार ने खर्च किए करोड़ों
गुर्जर मुखबिरों की वजह से 1981 में पान सिंह का भाई मातादीन पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था, जिसके बदले में पान सिंह ने गुर्जर समुदाय के छह लोगों की हत्या कर दी थी। इसके बाद पान सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री को सीधे चैलेंज कर दिया। इसके बाद उन्होंने पान सिंह को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का फरमान सुना दिया गया था। पुलिस ने पान सिंह के गांव के लोगों को नौकरी का लालच देकर मुखबिरी कराई। अक्टूबर 1981 में लगभग 10,000 की फ़ोर्स ने पान सिंह को घेरकर मार गिराया।
सीरीज में आगे देखिए पान सिंह के गांव भिड़ौसा की मौजूदा कहानी......
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