ग्वालियर। जयाजीराव सिंधिया राजकुमार नहीं थे, एक सिंधिया सरदार हनुमंत राव के बेटे भागीरथ राव थे। बचपन में ही सूझबूझ दिखाने की वजह से उन्हें गोद लेकर राजकुमार बनाया गया, और आगे चल कर इसी सूझबूझ से वो महाराजा जयाजीराव सिंधिया बन गए।
सिंधिया राजवंश के शासक जयाजीराव कि ग्वालियर के महाराज बाड़े पर प्रतिमा स्थापना के 100 पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर dainikbhaskar.com पेश कर रहा है उनके राजा बनने की रोचक कहानी....
कंचे के खेल में अचूक निशाना और रणनीतिक समझबूझ से बन गए महाराज
महाराजा जनकोजी राव सिंधिया 1843 में बहुत कम उम्र में ही मृत्यु को प्राप्त हुए, उनकी कोई संतान नहीं थी। सिंधिया रियासत को बचाने के लिए उनके मरणासन्न होने की खबर फैलने से पहले ही रियासत के वफादार सरदार संभाजी राव आंग्रे घोड़े पर सवार हुए, और वहां जा पहुंचे, जहां रियासत के सरदारों के बच्चे कंचे खेल रहे थे। सरदार आंग्रे ने देखा कि हनुमंत राव सिंधिया के बेटे भागीरथ राव का निशाना तो अचूक था ही, इसके साथ ही वह रणनीति बना कर खेल रहा था।
सूझबूझ से प्रभावित हो बना दिया महाराज
भागीरथ की समझबूझ देख सरदार आंग्रे ने उसे घोड़े पर बिठाया और तत्काल मरणासन्न जनकोजी के पास ले जाकर, उसे उनका गोद लिया वारिस घोषित करवा दिया। इस तरह 8 साल का भागीरथ राव जनकोजी राव की 14 साल की विधवा ताराबाई का बेटा बन कर महाराजा जयाजी राव सिंधिया बन गया।
28 साल बाद मिला जयाजीराव को महाराजा का अधिकार
सरदार आंग्रे की राज भक्ति और सूझबूझ से सिंधिया राजवंश को वारिस तो मिल गया, लेकिन जयाजी राव को महाराजा के सारे अधिकार 28 साल बाद 1885 में ही मिल सके। 8 साल का राजा और 14 साल की राजमाता को सत्ता-सूत्र सौंपने से कंपनी सरकार ने मना कर दिया, और अपने एजेंट दिनकर राव राजवाड़े को दोनों का रीजेंट बना दिया।
जयाजीराव के समय हुआ था 1857 का स्वतंत्रता संग्राम
इसी दौरान 1857 के संघर्ष का केंद्र बिंदु भी ग्वालियर ही बन गया। इस विद्रोह को समाप्त होने के बाद जब जयाजी राव युवा से प्रौढ़ हो गए तब कड़ी मशक्कत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1885 उन्हें महाराजा के अधिकार सौंपे, और इससे पहले 1857 से अब तक के सैनिक नुकसानों की भरपाई के लिए 15 लाख रुपए भी वसूल किए।
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