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सिर्फ नाम के ट्रामा सेंटर, हादसे में घायलों का नहीं होता इलाज
ट्रामा सेंटर के नाम पर करोड़ों की बिल्डिंग बनाकर मंत्री-विधायकों की लोकार्पण में रूचि। इलाज के लिए डॉक्टर पदस्थ किए मशीनें लगाई।
भास्करसंवाददाता| ग्वालियर/ चंबल अंचल
भिंडजिले के मुसावली गांव के 17 वर्षीय अमन शर्मा को शहर में 19 जुलाई को एक डंपर ने टक्कर मार दी। अमन के सिर में गंभीर चोट आई। उन्हें घायल हालत में जिला अस्पताल लाया गया, जहां ट्रामा सेंटर चालू होने के कारण उसे ग्वालियर रैफर किया गया। लेकिन आधी दूर पहुंचने पर ही उसने दम तोड़ दिया। अमन के पिता प्रदीप शर्मा कहते हैं- काश? हमारे शहर का ट्रामा सेंटर चालू होता तो बेटे की जान बच जाती।
जी हां, सरकार ने हादसे में घायल होने वाले लोगों तत्काल इलाज दिलाने के लिए हर जिले में ट्रामा सेंटर मंजूर किए। ज्यादातर जिलों में करोड़ों की लागत से ट्रामा सेंटर की बिल्डिंग भी बनकर तैयार हो गई, लेकिन तो उनमें डॉक्टर, नर्सिंग-तकनीकी स्टाफ पदस्थ किए और ही सीटी स्कैन, एमअारआई मशीनें लगवाई।
जीवित आया और रैफर के फेर में छोड़ गया दुनिया
25जून को गुना के परिवार का बड़ौदी पर हुए दर्दनाक हादसे में पांच लोगों की मौत तो मौके पर ही हो गई थी, जबकि रमेश रमेश (45) पुत्र ओमकार सोरैया, को घायल हालत में जिला अस्पताल लाया गया। सिर में चोट होने की वजह से डॉक्टरों ने ग्वालियर रैफर कर दिया और जब उन्हें एंबुलेंस में ले जाने की तैयारी चल रही थी, तभी कुछ दूर जाकर ही दम तोड़ दिया। जो परिजन जीवित बचे थे, जब उन्हें पता चला तो वे बोले कि जब घायल को बचाने का कोई इंतजाम ही नहीं है तो फिर क्यों ऐसे खोखले अस्पताल खोल दिए हैं।
क्यों जरूरी है ट्रॉमा केयर यूनिट
ट्रॉमाका मतलब है, ऐसी चोट अथवा घाव-जो किसी हादसे, हथियार या गिरने- फिसलने से आई हो। इन ट्रॉमेटिक इंजुरी (विशेष प्रकार की चोट) से घायल की जिंदगी बचाने के लिए अमेरिकन कॉन्सेंप्ट पर देशभर में ट्रामा केयर यूनिट्स की स्थापना की जा रही है। जिला स्तर पर लेवल-2 और लेवल-3 ट्रॉमा केयर यूनिट स्थापित की जा रही है। यह यूनिट्स इसलिए जरूरी हैं, क्योंकि हादसों में घायल लोगों को प्रारंभिक इलाज मिलने की वजह से सर्वाधिक मौतें दर्ज की गईं। ट्रॉमा सेंटर में घायलों की सर्जरी इलाज के जरूरी इंतजाम होते हैं, इसलिए ट्रॉमा केयर यूनिट्स बेहद जरूरी हैं।
51 जिलों में बना रहे हैं ट्रामा केयर यूनिट्स
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