दो बोलियों के बाद अटक गया प्रोजेक्ट
दिलचस्पबात तो यह है कि प्रदेश में ही निमाड़ी, बुंदेली, बघेली, मालवी, गोंडी, कोरकू सहित कई बाेलियां-उप बोलियां हैं। इन भाषाओं का भी शब्दकोश तैयार करना है, लेकिन अब प्रोजेक्ट ऑन, डिक्शनरी इन संस्कृत ऑफ डायलेक्ट्स एंड सब-डायलेक्ट्स ही अधर में है। मालवी-संस्कृत शब्दकोश में मालवी बोली के 13130 शब्द संग्रहित हैं। इन शब्दों का व्याकरण विश्लेषण भी किया गया है। इसमें लिंग, विशेषण क्रिया शामिल हैं।
पाठ्यक्रम तैयार करेंगे
हमनेदिल्ली कार्यालय में दो प्रस्ताव भेजे हैं। प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल जाने पर निमाड़ी बघेली बोलियों में भी दो शब्दकोश तैयार किए जाएंगे। हम तो चाहते हैं कि स्थानीय बोलियों से जो निष्कर्ष निकलता है, उनसे एक पाठ्यक्रम तैयार किया जाए। हमने शब्द की सांस्कृतिक यात्रा नामक प्रोजेक्ट भी दिल्ली भेजा है। लेकिन किसी भी परियोजना पर अब तक वहां से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। इसकी वजह बताई जा रही है कि यहां कोई कुलपति नहीं है।
प्रो.आजाद मिश्र, प्रिंसिपल,राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, भोपाल
ग्वालियर/भोपाल
राष्ट्रीयसंस्कृत संस्थान में पिछले तीन-चार साल में मालवी और बुंदेली बोलियों के संबंध में जोरदार काम हुआ है। दोनों बोलियों की यहां विस्तृत डिक्शनरी तैयार की गई। इसमें प्रत्येक शब्द का स्थानीय बोली में अर्थ, हिंदी में अर्थ और उसे फिर संस्कृत में बताया गया है। डिक्शनरी में बोली के शब्द की क्रिया, स्त्रीलिंग-पुल्लिंग आदि के साथ प्रयोग भी हैं। इस सराहनीय शब्दकोश को तैयार करने में साढ़े तीन साल लगे हैं। लेकिन अब यहां बोलियों का अनुसंधान संबंधी कार्य ठप हो गया है। बताया जा रहा है कि संस्थान के परियोजना विभाग में ही अनुसंधान संबंधी कोई महत्वपूर्ण काम नहीं हो रहा है।
शब्दोंको अर्थ सहित समझाया
यहां जो शब्दकोश तैयार किया गया है, उसमें इस बात पर जाेर दिया गया है कि क्षेत्रीय बोलियों के संस्कृत मूलक शब्दों का संकलन हो जाए। 331 पेज के इस शब्दकोश में बोलियों के शब्दों को अर्थ सहित समझाया गया है। राजा भर्तृहरि, कबीरदास आदि विद्वानों द्वारा मालवा के बारे में संस्कृत में जो कहा गया है, कहीं-कहीं उसका भी इसमें उल्लेख है। जैसे भर्तृहरि द्वारा बताया गया है कि धन्यो मालवमंडलो क्षितितले लोकस्य धर्मे रति:। वहीं कबीरदास ने बताया है कि देस मालवो गहन गभीर। डग डग रोटी पग पग नीर। कोई भी