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बिना प्राधिकरण तीन करोड़ खर्चे

7 वर्ष पहले
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खेलव्यवस्था को दुरुस्त करने और खिलाड़ियों सरकार में समन्वय बनाने के लिए शुरू किया जाने वाला खेल प्राधिकरण कागजों में ही संचालित होकर खत्म हो गया। इसके गठन को लेकर लगातार दबाव बढ़ रहा था तो गत वर्ष कुछ लोगों को सदस्य बनाया गया, लेकिन उन्हें किसी भी बैठक में बुलाया ही नहीं गया। जब सरकार की किरकिरी होने लगी तो कागजों में शुरू किया गया प्राधिकरण कागजों में ही बंद कर दिया। लेकिन सवाल यह है कि इस दौरान जो तीन करोड़ रुपए अनुदान बांटा गया, वो कहां खर्च हुआ? दूसरा बड़ा सवाल यह है कि जिस क्रीड़ा परिषद को भंग करने की सूचना स्वयं डायरेक्टाेरेट स्पोर्ट्स की वेबसाइट पर दी गई है तो फिर परिषद के नाम पर इतने सालों से बजट किसे दिया गया हैै? इस बारे में बात करने पर जिम्मेदारों ने चुप्पी साध ली है।

खिलाड़ियों को फायदा होता

क्रीड़ापरिषद भंग होने के बाद खेल प्राधिकरण को लेकर कभी किसी भी स्तर पर मुझसे चर्चा नहीं की गई। यदि प्राधिकरण अस्तित्व में आता तो प्रदेश के खिलाड़ियों काे फायदा होता।

ओमयादव, पूर्वउपाध्यक्ष, क्रीड़ा परिषद (अब यह भंग हो गया है)

कभी नहीं बुलाया

मुझेपिछले साल अगस्त में प्राधिकरण का सदस्य बनाया गया था। लेकिन इसके बाद कभी उनकी तरफ से किसी बैठक या अन्य कारण से कोई पत्राचार नहीं हुआ। अभी इसके भंग होने की भी कोई सूचना हमें नहीं दी गई है।

डी.के.विद्यार्थी, सदस्य