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सीमा सुरक्षा के साथ राष्ट्र निर्माण में भी सैन्य बलों की महती भूमिका

7 वर्ष पहले
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देशकी सीमाओं पर जवान सुरक्षा ही नहीं करते बल्कि राष्ट्र के निर्माण में भी महती भूमिका का निर्वहन करते हैं। हम सभी को राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देना चाहिए और यह हमारा कर्तव्य भी है। हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हम भारतीय हैं। जब भी युद्ध का मौका आया, हमारी सेना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। सदैव युद्ध के मोर्चे पर देश के मान और सम्मान को बनाए रखा। यह बात रविवार को डाॅ. भगवत सहाय मेडिकल सभागार में आयोजित कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) केटी परनाईक ने बतौर मुख्य अतिथि कही। कार्यक्रम का आयोजन नागरिक परिषद ने 16 दिसंबर 1971 विजय दिवस के उपलक्ष्य में किया था।

समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में पूर्व अतिरिक्त निदेशक बीएसएफ पद्मश्री चमनलाल ने सैन्य बलों की राष्ट्र निर्माण के परिपेक्ष्य में भूमिका को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति के भीतर भारतीय होने का गर्व ही राष्ट्र निर्माण में उन्हें अग्रसर करता है। विभिन्न क्षेत्रों में केवल प्रगति से राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता, हमें देश की सभ्यता संस्कृति को लेकर अपनत्व का भाव पैदा करना होगा। हमारे सैन्यबल ने सदैव ही सर्वोत्कृष्ट नजीरें पेश की हैं। वरिष्ठ पत्रकार लोकेंद्र पाराशर ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। संचालन प्रो. राजेन्द्र बांदिल ने किया

पीठमें नहीं सीने पर गोली खाई: एमिटीविश्वविद्यालय के कुलपति और पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल वीके शर्मा ने कारगिल युद्ध की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि एक घायल जवान ने कहा कि सर, मेरे घायल होने की सूचना अगर परिजन को दी जाए तो उन्हें बताया जाए कि मैंने गोली पीठ पर नहीं सीने पर खाई है।

छात्रों ने देखे सुरक्षा बलों के शस्त्र

बीएसएफऔर सेना द्वारा लगाई गई शस्त्र और चित्र प्रदर्शनी में छात्रों ने अपने सवालों के जवाब भी पाए। चित्र प्रदर्शनी में उन बहादुर जवानों का जिक्र भी किया गया था, जिन्होंने विभिन्न मौकों पर अपनी शहादत दी थी। बीएसएफ के बैंडवादकों ने अतिथियों के स्वागत में बैंड और अंत में वंदेमातरम की धुन भी बजाई।

डॉ. भगवत सहाय सभागार में समारोह को संबोधित करते सेवानिवृत्त ले. जनरल केटी परनाईक शस्त्र प्रदर्शनी देखते छात्र।