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भूखे को रोटी देना, प्यासे को जल पिलाना ही सेवा
आचार्य रामदयाल ने कहा-
भक्तिवादका अर्थ मंदिर में हाथ जोड़कर स्वार्थ के लिए प्रार्थना करने की बजाय भूखे को रोटी देना, प्यासे का जल पिलाना, गरीब की सहायता ही नि:स्वार्थ सेवा है। इस तरह की सेवा करना ही राष्ट्र भक्ति है। नर सेवा ही नारायण सेवा है। यह विचार अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा से आए आचार्य रामदयाल महाराज ने लक्ष्मीगंज स्थित रामद्वारा में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि भक्ति का अर्थ सेवा होता है। भक्ति के कई प्रकल्प हैं निष्काम भक्ति, श्वेताम भक्ति। नौ भक्ति में से एक भक्ति भी अगर मानव के जीवन में खरी उतरती है तो मानव केवल रामभक्त बनेगा बल्कि राष्ट्र भक्त भी बन जाएगा। अगर हम माता-पिता की सेवा करते हैं तो मातृ भक्ति, गुरु सेवा करते हैं तो गुरु भक्ति, राष्ट्र सेवा करते हैं तो राष्ट्र भक्ति कहलाती है। मानव के अंतर्मन में भक्ति ही मानव की प्रथम सेवा है।
उन्होंने कहा कि मानव की संख्या तो तेजी से बढ़ रही है परंतु मानवता घटती जा रही है। सबसे पहले भक्ति पर स्वतंत्र कदम रखने के लिए भगवान ने मनो ध्वजा, धर्म मन ध्वजा, सत्यम वद का संदेश दिया है। कोई भी प्रवचन सुनकर हमें उसका चिंतन और मनन करना चाहिए। प्रवचन के उपरांत आरती की गई।