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माता-पिता बने गुरु, अब बेटियां आगे बढ़ा रही हैं ग्वालियर घराने की परंपरा
जब मंच और पंडाल हो गया खाली, समाधि पर हुई सभा
ग्वालियर घराना
सबसे पुराना है
ग्वालियरकी समृद्ध संगीत विरासत सदियों पुरानी हैं। इस संगीत परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब बेटियां निभा रही हैं। इसकी शुरुआत
हालांकि ग्वालियर घराने के मूर्धन्य गायक पद्मभूषण पंडित कृष्णराव शंकर पंडित की पौत्री मीता पंडित ने की। इसके बाद निरंतर ग्वालियर संगीत घरानों से जुड़े परिवार की बेटियां आगे रही है। इसके लिए उनके फैमिली मेंबर अभिभावक के साथ गुुरु की भूमिका भी निभा रहे हैं। संगीतज्ञों का कहना है कि बेटोें ने जब से संगीत से दूरी बना ली है, तब से बेटियों का रुझान इसमें बढ़ा है।
चार दिवसीय तानसेन समारोह में पंडाल में आठ सौ लोगों के बैठने की व्यवस्था की है। इसमें दो एक्जीबिशन और संगीतकारों की प्रस्तुति त्रि-स्तरीय मंच बनाया गया है।
संगीत समारोह की पूरी तैयारी पर अचानक हुई बारिश ने पिछले वर्ष पानी फेर दिया। ऐसे में प्रारंभिक सभा की वैकल्पिक व्यवस्था तानसेन कला वीथिका में हुई। इससे कार्यक्रम दो घंटे विलंब से शुरू हुआ, लेकिन प्रस्तुति देने आए कलाकारों ने पूरे मन से प्रस्तुति दी।
-अशोक आनंद, रंगकर्मी
सन् 1989-90 में जब पूरी रात की सभाएं होती थीं, मुझे पंडित रवि शंकर, अमजद अली खां, परवीन सुल्तान और पंडित शिव कुमार शर्मा काे सुनने के लिए पूरी रात का इंतजार करना पड़ा। इन कलाकारों की प्रस्तुति सुबह चार बजे हुईं। -नीलिमा शर्मा, म्यूजिकटीचर
समारोह में सन् 1960 से पहले अयोध्या के हनुमानगढ़ी मंदिर के महंत रमा शंकर बिन बुलाए आए। उन्होंने जब पखावज बजाने के लिए अनुमति मांगी तो नहीं मिली, तो समाधि पर पखावज बजाना शुरू कर दिया। जिसे सभी ने वहीं बैठकर सुना। डॉ.कमल वशिष्ठ, वरिष्ठरंगकर्मी
बात 1972-73 की है, मेरे दादाजी (पं. कृष्णराव पंडित) और उस्ताद बिसमिल्ला खां की प्रस्तुति से समारोह शुरू होना था। मंच से राष्ट्र के नाम संदेश (भारत-पाकिस्तान युद्ध), ट्रांजिस्टर के माध्यम से प्रसारित हुआ। जिसके कारण समारोह नहीं हो सका।
शंकरपंडित, प्रिंसिपल,शंकर गांधर्व कॉलेज
1पहले खुदअब बेटी करेगी ग्वालियर घराने का प्रचार-प्रसार
सिटी सेंटर निवासी रंजना टोडपे का कहना है मेरे घर में शुरू से ही संगीत का माहौल रहा है। पिता भालचंद्र रानड़े से खयाल गायकी सीखी। ताकि ग्वालियर घराने की गायकी से जुड़ी रहं