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जो सम्मान इंग्लिश को वैसा ही दें हिंदी को

7 वर्ष पहले
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हमारीमातृभाषा हिंदी है और आज हमें ही हिंदी दिवस मनाने की जरूरत पड़ रही है। व्यक्ति और सोसाइटी ने इंग्लिश को सम्मान की भाषा मान लिया है जबकि यह गलत है। आज देश में हिंदी की जो स्थिति है कहीं कहीं उसके जिम्मेदार हम लोग ही हैं। बच्चों को कॉन्वेंट और प्राइवेट स्कूल भेजते समय अगर उन्हें यह हिदायत दी जाती कि इंग्लिश सीखना जितना जरूरी है उससे कहीं ज्यादा हिंदी, तो शायद आज यह नौबत नहीं आती। आज यह स्थित निर्मित हम लोगों ने की है।

अब इसे सुधारना भी हमे होगा। इसके लिए जरूरी है कि युवाओं को अच्छा साहित्य देना होगा। यह मानना है हिंदी के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले शहर के लोगों का। उनका कहना है कि घर से लेकर स्कूलों में हिंदी की क्या स्थिति है यह किसी से छिपा नहीं है। हिंदी दिवस पर सिटी भास्कर ने जाना कि हिंदी को कैसे और मजबूत बनाया जा सकता है।

हिंदी में भी बेहतर कॅरियर

हिंदी उपेक्षित हो रही है। ये भाषा में साम्राज्यवाद का आरंभ है। ऐसा नहीं कि इंग्लिश पढ़ने वालो को ही अच्छी जॉब मिलती है। हिंदी के क्षेत्र में भी अपार संभावनाएं हैं। जरूरत है लोगों को इसके प्रति जागरूक करने की। यह तभी संभव होगा जब हम अंग्रेजी रूपी द्वार को बंद कर हिंदी के लिए द्वार खोलेंगे।

-जगदीशतोमर, साहित्यकार

संस्कार के साथ पढ़ाएं हिंदी

लोगों में भाषा के प्रति चेतना खत्म हो रही है। खासतौर से युवा पीढ़ी में। जरूरी है कि बच्चों को संस्कार देने के साथ उन्हें उसी तरह हिंदी की शिक्षा भी दी जाए। नई पीढ़ी को हिंदी से कोई बैर नहीं है लेकिन भाषा के प्रति लापरवाही है। उन्हें बताना चाहिए कि देश में होने वाली परीक्षाएं वह हिंदी में भी दे सकते हैं।

-डॉ.राजरानी शर्मा, विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग केआरजी कॉलेज

मानसिकता बदलनी होगी

लोगों की मानसिकता बन गई है कि हिंदी से कुछ नहीं होने वाला। यह केवल अपने प्रदेश या देश तक ही सीमित है जबकि ऐसा नहीं है। लोगों की मानसिकता बदलकर उनमें हिंदी के प्रति चेतना जागृत की जा सकती है। यह बात सही है हिंदी का जो विकास देश में होना चाहिए था वो नहीं हो सका है।

-डॉ.दिवाकर विद्यालंकार, रिटायर्ड प्रिंसिपल

हिंदी के अच्छे लेखकों की जरूरत

आज से 20 साल पहले जो हिंदी लिखी और पढ़ी जाती थी अब उसमें कहीं कहीं गिरावट आई है। अब हिंदी में अज्ञेय, महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद