कुल बनने हैं प्रमाण-पत्र 2.87 लाख
जाति प्रमाण पत्र: अफसरों में डर, छात्र परेशान, प्रोग्रेस 10% से कम
अधूरेदस्तावेज के आधार पर जाति प्रमाण-पत्र बनाने में अफसर डरते हैं। इसी कारण प्रोग्रेस दस फीसदी तक भी नहीं पहुंच सकी है। दूसरी तरफ प्रमाण-पत्र बनने से स्कूली छात्रों के काम रुक गए हैं और वे परेशान हैं। दस्तावेज अधूरी जानकारी के कारण ही चालीस फीसदी आवेदन रिजेक्ट हो रहे हैं।
जाति प्रमाण-पत्र के लिए स्पेशल अभियान चल रहा है। ग्वालियर में ही 2 लाख 87 हजार 160 छात्रों के प्रमाण-पत्र बनने हैं। इनके फार्म स्कूल स्तर पर जमा हो रहे हैं पर इनमें मांगी गई जानकारी नहीं होती है। जीवाजीराव स्कूल में लगे शिविर में आधे से ज्यादा फार्म इसीलिए रिजेक्ट हो गए कि पालक पहले कहां रहते थे, इसका दस्तावेज नहीं था। ऐसी ही स्थिति दो दिन पहले जनकगंज स्कूल में लगे शिविर में बनी। यहां भी बड़ी संख्या में पटवारी, राजस्व निरीक्षक तहसीलदार ने जांच के बाद फार्म रिजेक्ट कर दिए।
छात्र-पालकों की दिक्कत
अजा-जजाके आवेदकों से अफसर 1950 का कोई ऐसा दस्तावेज मांगते हैं जो यह साबित कर सके कि वे कहां के रहने वाले हैं। पिछड़ा वर्ग के आवेदकों को 1984 का रिकॉर्ड देना होता है। फार्म भरने वाले 90 % लोग यह दस्तावेज नहीं दे पाते हैं। इससे फार्म रिजेक्ट हो जाते हैं।
पेंडेंसीसे अफसर भी परेशान
जातिप्रमाण-पत्रों की पेंडेंसी से सभी एसडीएम परेशान हैं। इनका कहना है कि आवेदक फार्म में फोटो, कहां के मूल निवासी हैं की जानकारी, मोबाइल-फोन नंबर या फिर पूरा एड्रेस नहीं लिखता है। इससे फार्मों का निपटारा तत्काल नहीं हो पा रहा है।
जानकारीछुपाएं आवेदक
एसडीएममहीप किशोर अखिलेश जैन ने कहा कि बाहर से आए पालक-छात्र जहां के मूल निवासी हैं उस जिले का नाम नहीं लिखते हैं। यदि वे ऐसा करें तो फार्म उसी जिले में भेजकर प्रमाण-पत्र बन सकता है। ऐसा करने पर ही फार्म ज्यादा रिजेक्ट हो रहे हैं।
अन्य पिछड़ा वर्ग
118000
अनुसूचित जनजाति
14,383
अनुसूचित जाति
84,635