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कराते खिलाड़ी का करियर दांव पर

7 वर्ष पहले
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कुछमाह बाद दक्षिण कोरिया में होने वाले एशियाड गेम्स और जनवरी 2015 में केरल में आयोजित होने वाले 35वें राष्ट्रीय खेल से कराते को अलग कर दिया गया है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि जाे संघ कराते की प्रतियोगिताएं आयोजित कराते हैं, उन्हें भारतीय ओलिंपिक संघ से मान्यता नहीं मिल पाई है। इसके बाद भी भारतीय ओलिंपिक संघ ने एक टीम का चयन करके दक्षिण कोरिया में स्पर्धा के लिए नाम भेज िदए थे, लेकिन वहां इसे मानने से इंकार कर दिया गया।

डीबी स्टार ने भारतीय ओलिंपिक संघ की वेबसाइट पर सर्च किया, तो पता चला कि वहां रजिस्टर्ड संघ की सूची में से कराते संघ का नाम ही नहीं है। इसका नुकसान बाकी राज्यों को हुआ है और वहां की सरकारों ने संघों को बुलाकर इसका हल निकालने के लिए कह दिया है, लेकिन मप्र में अब तक इस मामले में कोई पहल नहीं की गई है। यहां तक कि इस विषय पर मप्र खेल विभाग के प्रमुख सचिव बात करने से भी बच रहे हैं। इस बात से वे तमाम खिलाड़ी, जो कराते खेल के दम पर एकलव्य, विश्वामित्र और विक्रम अवाॅर्ड जीतकर नौकरी कर रहे हैं, बेहद डरे हुए हैं। दरअसल मप्र शासन की खेल नीति में नियम है कि ये अवॉर्ड उन्हीं खिलाड़ियों को दिए जाएंगे, जो भारतीय ओलिंपिक संघ से मान्यता प्राप्त संघ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक या मैडल जीते हों। पुराने मामले में तो फिलहाल सरकार को विचार करना है, लेकिन उन खिलाड़ियों का भविष्य अंधकारमय हो गया, जो कराते के दम पर इस बार अवाॅर्ड की दौड़ में शामिल हैं।

शासन की चुप्पी

अमान्य संघ के पदाधिकारी हैं कोच

मप्र राज्य मार्शल अकेेडमी के चीफ कोच जयदेव शर्मा हैं और रतन गंभीर भी कराते कोच हैं। ये दोनों विश्वामित्र अवॉर्ड ले चुके हैं और दोनों ही मप्र कराते एसोसिएशन के पदाधिकारी भी हैं। यह वही संघ है, जिसे भारतीय ओलिंपिक संघ से मान्यता नहीं दी गई है। इतना ही नहीं यह जानकारी होने के बाद मप्र शासन ने केवल इन्हें नौकरी दी, बल्कि इनके संघ को कराते कैम्प लगाने के लिए 14 लाख रुपए का अनुदान भी दिया था।

इस मसले में बात करने के लिए डीबी स्टार ने खेल विभाग के प्रमुख सचिव एम. मोहन राव से बार-बार संपर्क किया। आखिर में उन्हें एसएमएस के जरिए भी पूरी बात बताई, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया।

मान्यता भारत सरकार देती है

भारतीय ओलिंपिक संघ की मान्यता की आवश्यकता हमें नहीं है।