मुरैना. मुरैना जिले में बेटियों की घटती संख्या पर अंकुश नहीं लग रहा है। कन्या भ्रूण हत्या पर प्रभावी अंकुश न लग पाने के कारण बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है। जो बेटियां पैदा हो जाती हैं उनकी परवरिश भी ढंग से नहीं होती, जिससे बेटियां छह माह की आयु से पहले मर जाती हैं। लिंगानुपात का अंतर कैसे कम होगा इस पर स्वास्थ्य विभाग गंभीर नहीं है।
वर्ष 2014-15 के आंकड़ों पर नजर डालें तो दिसंबर तक जिले में 33661 बेबी पैदा हुए हैं। उनमें से बेटियों की संख्या 15961 तक सीमित रह गई है। जबकि मेल बेबी की संख्या 17700 तक पहुंच गई है। यह परिदृश्य 1739 के लिंगानुपात को उजागर कर रहा है। इसके अलावा मार्च 2013 से अप्रैल 2014 के बीच पैदा हुए 41294 बच्चों में से बेटियों की संख्या 19608 तक रह गई और बेटों की संख्या 21686 तक जा पहुंची।
तब भी लिंगानुपात 2078 का अंतर लिए रहा। लिंगानुपात को कम करने के लिए राज्य शासन कागजों में बड़े अभियान चला रहा है लेकिन उनका प्रभावी असर बेटियां बचाने के रूप में देखने को नहीं मिल रहा है।
बेटियों की परवरिश में भी पक्षपात
नवजात से लेकर छह माह की आयु के बीच कन्याओं की मौत के आंकड़े भी कम नहीं हो रहे हैं। कारण सामने आ रहा है कि बेटियों की परवरिश में उनके माता-पिता पक्षपात कर रहे हैं। अतिकुपोषण के कारण बेटियां दम तोड़ देती हैं।
पोषण पुनर्वास केन्द्रों पर गौर करेें तो वहां बेटों की तुलना में बेटियां ही ज्यादा भर्ती करायी जा रही हैं। इससे जाहिर है कि बेटों की तुलना बेटियों में कुपोषण में कहीं अधिक है क्योंकि बेटियों का लालन-पालन ठीक से नहीं किया जा रहा है।
सोनोग्राफी सेंटरों की नहीं हो रही मॉनीटरिंग
कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए तत्कालीन कलेक्टर मदन कुमार ने शहर के अधिकांश सोनोग्राफी सेंटर्स पर स्पेशल डिवाइस लगवाई थी। उसकी मानीटरिंग कलेक्टोरेट से की जाना थी लेकिन डिवाइस लगने के बाद से लेकर अब तक किसी कलेक्टर ने सोनोग्राफी सेंटर की गतिविधियों को रेंडम चेक नहीं किया है।