ग्रामीणों ने बताया कि हाल ही में गांव में मनीराम सेन की मां राजरानी की मौत हो गई। दाह संस्कार के लिए शव को पहाड़ी पर ले जाया गया। लकड़ी गीली होने की वजह से उस पर घी डाला गया, कई प्रयास करने पर भी जब आग नहीं जली तो मजबूरी में कैरोसिन डालकर चिता को जलाया गया। इसके बाद घर लौटे मनीराम की दूसरे दिन तबियत बिगड़ गई। उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। इस बीच उसकी 16 वर्षीय पुत्री दीक्षा की तबीयत बिगड़ गई। एक दिन बाद उसकी भी मौत हो गई। उसके चाचा ने दूसरे गांव में दीक्षा का अंतिम संस्कार किया।
गांव के लोगों का कहना है कि यह परेशानी बारिश में हमेशा बनी रहती है। कई बार तिल्ली की झाड़ियों से अंतिम संस्कार करना पड़ा। ग्रामीणों के मुताबिक उक्त अस्थाई शमशान तक पहुंचने का आधा रास्ता भी खराब है। इस कारण आम दिनों में भी वहां तक पहुंचने में काफी परेशानी आती है। गांव की आबादी तीन हजार है, बावजूद इसके यहां अभी तक श्मशान घाट नहीं बन सका।
सरपंच ने यह बताई परेशानी
मैं दलित सरपंच हूं। यहां शमशान की कुछ भूमि पर लोग कब्जा किए हुए हैं। शमशान घाट के लिए हमें फंड भी नहीं मिला तो कहां से चबूतरा व टीनशेड लगवा दें। पहाड़ी के पीछे जाने वाला अधूरा रास्ता भी सात साल पहले पूर्व सरपंच ने बनवाया था।
- गोपाल जाटव, सरपंच ग्राम पंचायत झंडा
झूठ बोल रहा सरपंच: एसडीएम
सभी गांव में शांतिधाम के नाम से शमशान घाट बनाने के लिए राशि शासन की ओर से आई है। सभी पंचायतों को यह फंड भी दिया गया है। यदि फंड न मिलने की बात सरपंच कह रहा है, तो वो झूठ बोल रहा है। उसने शमशान बनवाया नहीं होगा, इसलिए इस तरह के बहाने बना रहा है।
- एके चांदिल, एसडीएम करैरा
(फोटो- वह खुला स्थान जहां राजरानी सेन का अंतिम संस्कार किया गया।)