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एक हाथ से जिसने चटाई पाकिस्तान को धूल, देश में नहीं मिला सम्मान

8 वर्ष पहले
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ग्वालियर। विदेशी धरती पर भी भारतीय नि:शक्त क्रिकेट टीम का नाम रोशन कर चुके गुरुदास राउत को अपने ही प्रदेश में सम्मान नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने पाकिस्तान समेत कई जगह टीम को सीरीज जितवाई, लेकिन मप्र शासन की तरफ से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। इस कारण वे अब नागपुर जाकर पढ़ाई कर रहे हैं और मप्र नि:शक्त क्रिकेट टीम एक अच्छे खिलाड़ी से वंचित है।

राजधानी की सड़कों पर तीन दिन तक भटकने और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद गुरुदास पिछले सप्ताह वापस नागपुर चले गए। ये वही गुरुदास हैं,जिन्होंने जून 2012 में पाकिस्तान की धरती पर भारतीय नि:शक्त क्रिकेट टीम को जीत दिलाई। गुरुदास भारतीय नि:शक्त क्रिकेट टीम के ऑलराउंडर खिलाड़ी हैं और उनका बायां हाथ कोहनी के पास से नहीं है।

गुरुदास बड़ी आशाओं के साथ राजधानी आए थे कि जो प्रदेश सरकार दूसरे राज्यों के खिलाडिय़ों को लाखों रुपए बांटदेती है, वह प्रदेश के खिलाड़ी के लिए कम से कम पढ़ाई का इंतजाम तो करवा ही देगी। लेकिन तमाम सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा।

मामला डीबी स्टार के पास आया तो गुरुदास के क्रिकेट टीम के कप्तान बनने की कहानी सामने आई। कई बार किया है शानदार प्रदर्शन गुरुदास छिंदवाड़ा जिले की पांढुर्णा तहसील के तिगांव के रहने वाले एक किसान रामदास राउत के बेटे हैं। गुरुदास बचपन से ही प्रतिभाशाली हैं, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने और शासन की तरफ से कोई मदद नहीं मिल पाने के कारण वे नागपुर अपने एक रिश्तेदार के यहां पढऩे चले गए थे।

वहां वे नियमित रूप से क्रिकेट ग्राउंड पर प्रैक्टिस करने जाते थे। जब वहां एक मैच के दौरान नि:शक्त क्रिकेट टीम के चयनकर्ता की नजर गुरुदास पर पड़ी तो उन्होंने उसे टीम में शामिल कर लिया। इसके बाद गुरुदास ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने देश विदेश की पिचों पर कई बार शानदार प्रदर्शन किया है।

गुरुदास नि:शक्त भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान भी रह चुके हैं। आकर मिले, मदद दिलवाएंगे यदि वह प्रतिभाशाली है और मप्र की तरफसे खेलेगा तो बिल्कुल उसको मदद मिलेगी। एक बार आकर मिले।

गोपाल भार्गव, मंत्री, सामाजिक न्याय