ग्वालियर. पांव भले ही बेजान हैं लेकिन हौसलों में जान है। बचपन में पोलियो के शिकार होने से अपंग हुए दीपक द्विवेदी हौसले के सहारे जिंदगी की उड़ान भर रहे हैं। उनकी यह उड़ान उन जैसे दूसरे लोगों का सहारा भी बन रही है आैर आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दे रही है।
32 वर्षीय दीपक सिआेल (कोरिया) में चौथी अंतरराष्ट्रीय एबिलिंपिक्स में हिस्सा लेने के बाद अगले साल फ्रांस के बोरडाउक्स में होने वाली एबिलिंपिक्स में भाग लेने जा रहे हैं। इन्होंने अपनी पढ़ाई की और आगे बढ़े, अब यह अपने जैसे आर्थिक और शारीरिक रूप से अभावग्रस्त बच्चों को अपनी विधा सिखाते हैं ताकि उनके जीवन की रुकावटें दूर हो जाएं।
भिंड के रौन में रहने वाले दीपक ने अशोक नगर पॉलीटेक्निक से 2004 में इलेक्ट्रॉनिक एंड टेलीकम्युनिकेशन में डिप्लोमा किया। प्राइवेट स्कूल और कॉलेजों में नौकरी शुरू की और नौकरी करने के साथ इलेक्ट्रॉनिक मॉडल बनाने का काम शुरू किया, यह काम उन्हें आगे ले गया। इन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया। इन्होंने तीन राष्ट्रीय एबिलिंपिक्स में भाग लिया और प्रथम पुरस्कार जीता।
इसे बाद 2011 में यह अंतरराष्ट्रीय एबिलिंपिक्स प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए सिओल गए। 2016 में होने वाले नवें अंतरराष्ट्रीय एबिलिंपिक्स में भाग लेने के लिए इन्हें फ्रांस जाना है। चंडीगढ़ में हुए चाैथे एबिलिंपिक्स में इन्होंने अपने वर्ग में विजेता बनकर अंतरराष्ट्रीय एबिलिंपिक्स में जाने की पात्रता हासिल कर ली।
अब तक का सफर :
- तीसरी नेशनल एबिलिंपिक्स में 2010 में जीत हासिल की।
- 2011 में 8वीं इंटरनेशल एबिलिंपिक्स में चौथा स्थान प्राप्त किया।
- चौथी नेशनल एबिलिंपिक्स स्पर्धा 2014 में चंडीगढ़ में विजेता बने।
- हर्डल फ्री होम फोर सीनियर एंड डिसएबल सिटीजन मॉडल तैयार किया।
प्रभु जिसे एक कमजोरी देते हैं तो उस कमजोरी को दूर करने के लिए मजबूत आत्मबल भी देता है। मेरे साथ भी प्रभु ने यही किया है। पोलियो ने मेरे पैर छीने लेकिन मेरी हिम्मत ने कभी जवाब नहीं दिया। इसी हिम्मत की वजह से मैं आगे बढ़ा हूं। अपने जैसे लोगों को आगे बढ़ाने के लिए जब भी मौका मिलता है तो मैं उसे छोड़ता नहीं हूं। -दीपक द्विवेदी
अपने जैसों को आगे बढ़ाने का दिखाया जज्बा
दीपक ने अपने जैसे आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर लोगों को आगे बढ़ाने का जज्बा दिखाया है। ऐसे बच्चे जो आर्थिक या शारीरिक रूप से अशक्त हैं। उन्हें इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाने का काम भी दीपक सिखा रहे हैं। पहले यह तारागंज में एक कमरा किराए पर लेकर बच्चों को सिखाते थे। अब यह अपने घर न्यू कॉलोनी नंबर-2 में कुछ बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाना सिखा रहे हैं।