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मान्यता बचाने के प्रयासों को लगा झटका

9 वर्ष पहले
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ग्वालियर. मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के निरीक्षण के मद्देनजर गजराराजा मेडिकल कॉलेज में रातोंरात छह प्रोफेसर की पोस्टिंग के बाद भी कॉलेज की मान्यता पर लटकी तलवार हटी नहीं है। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने यहां ऐसे पांच प्रोफेसर्स को पदस्थ किया, जिन्हें इसी साल इंदौर, जबलपुर और रीवा के मेडिकल कॉलेज में एमसीआई के निरीक्षण के दौरान तैनात बताया गया था। एमसीआई की टीम के सामने यह गंभीर चूक उजागर होने से चिकित्सा शिक्षा विभाग के अफसरों को पसीना आ गया, अब उन्हें मान्यता बचाने के लिए नया रास्ता खोजना पड़ रहा है। मान्यता के नवीनीकरण के लिए शुक्रवार को एमसीआई की टीम के सदस्य डॉ. एएन मिश्रा डीन मेडिकल कॉलेज जमशेदपुर, डॉ. राकेश व्यास मेडिकल कॉलेज अहमदाबाद, डॉ. बालकिशन मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज नई दिल्ली ने सुबह नौ बजे से कॉलेज से जुड़े लगभग 450 अधिकारियों और कर्मचारियों को शिनाख्तगी के लिए बुलवाया। मान्यता बचाने... प्रत्येक कर्मचारी के दस्तावेज की जांच शुरू की गई। टीम के सदस्यों ने प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर ,असिस्टेंट प्रोफेसर, जूनियर रेसीडेंट्स, सीनियर रेसीडेंट्स, पीजी छात्रों के छात्रों के दस्तावेजों की मूल प्रति देखी। इसके साथ फार्म-16 की भी जांच इसलिए की, जिससे यह पता चल सके कि उक्त स्टाफ को निरीक्षण को देखते हुए दूसरे कॉलेजों से नहीं बुला लिया। यह कार्रवाई शाम साढ़े सात बजे के बाद तक चली। एमसीआई की टीम शनिवार को ओपीडी और जेएएच, केआरएच का निरीक्षण करेगी। रातोंरात की थी पोस्टिंग एमसीआई की टीम के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी विभाग में कम से कम एक प्रोफेसर, दो एसोसिएट प्रोफेसर, तीन असिस्टेंट प्रोफेसर तथा चार डिमांस्ट्रेटर या सीनियर रेसीडेंट होने चाहिए। जीआरएमसी में रेडियोलॉजी, बाल रोग विभाग, फार्माकोलॉजी, मनोविज्ञान, एनाटॉमी, निश्चेतना विभाग, फिजियोलॉजी विभाग में प्रोफेसर के पद रिक्त थे। एमसीआई के निरीक्षण को देखते हुए चिकित्सा शिक्षा विभाग ने रातों-रात छह प्रोफेसरों को जबलपुर, इंदौर और रीवा मेडिकल कॉलेज से यहां भेजने के आदेश जारी करते हुए उन्हें शुक्रवार की सुबह जीआरएमसी में ज्वाइनिंग देने को कहा था। इन छह प्रोफेसरों में से जबलपुर मेडिकल कॉलेज से रेडियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार शर्मा और फार्माकोलॉजी के प्रोफेसर डॉ.एसपी पांडेय, रीवा मेडिकल कॉलेज से एनाटोमी के प्रोफेसर डॉ.डीसी नायक और फिजियोलॉजी की प्रोफेसर डॉ. एम शीतलकर, इंदौर मेडिकल कॉलेज के निश्चेतना के प्रोफेसर डॉ. एसआर लाड ने शुक्रवार की सुबह ही अपनी ज्वाइनिंग दे दी, किंतु इंदौर के पीडियाट्रिक के प्रोफेसर डॉ. एसपी वर्मा नहीं आए। वीडियोग्राफी भी कराई एमसीआई के निरीक्षण में पहली बार यह देखने में आ रहा है कि हेड काउंटिंग और दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराई जा रही है। वीडियोग्राफी करने का कारण यह है कि यहां जिन डॉक्टरों का वेरीफिकेशन यहां हो गया है, वे दूसरे कॉलेजों में अपना वेरीफिकेशन नहीं करा पाएं। आगे क्या चिकित्सा शिक्षा विभाग के पास इस संकट से निपटने के लिए जीआरएमसी के एसोसिएट प्रोफेसरों को समयबद्ध पदोन्नति देकर प्रोफेसर बनाना ही एकमात्र रास्ता है। इससे एमसीआई के मापदंड भी पूरे हो जाएंगे और मान्यता भी बच जाएगी। सूत्रों का कहना है कि इस बारे में डीन ने डीएमई से चर्चा के बाद तीन क्लीनिकल विभागों के एसोसिएट प्रोफेसरों को समयबद्ध पदोन्नति देने का फैसला किया है। इस बारे में अंतिम निर्णय शनिवार को लिया जा सकता है। उधर, इंदौर, जबलपुर और रीवा के मेडिकल कॉलेजों से रातोंरात भेजे गए पांचों प्रोफेसर्स को यहां एमसीआई द्वारा अमान्य कर दिए जाने से इनकी पोस्टिंग पुन: उन्हीं स्थानों पर वापस की जा सकती है। निरीक्षण में पकड़े, एमसीआई ने नकारे दस्तावेजों के परीक्षण के दौरान जबलपुर से आए रेडियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार शर्मा का जैसे ही नंबर आया, एमसीआई की टीम के सदस्य चौंक गए। दरअसल डॉ. शर्मा इसी साल एमसीआई के निरीक्षण के दौरान जबलपुर मेडिकल कॉलेज में पदस्थ थे। इस आधार पर टीम ने डॉ. शर्मा को यहां पदस्थ मानने से इनकार कर दिया। इनके साथ ही गुरुवार देर रात आनन-फानन में यहां पदस्थ किए गए चार अन्य प्रोफेसर्स को भी यहां से अमान्य कर दिया गया। > शासन ने जिन पांच प्रोफेसरों को भेजा था उन्हें एमसीआई ने नहीं माना, अब क्या करेंगे? > हां एमसीआई ने पांचों प्रोफेसरों को नहीं मान्य नहीं किया हैं। > समयबद्ध पदोन्नति क्यों नहीं दी जा रही ? > विचार कर रहे हैं, कल पता चल जाएगा। > पहले ही डीपीसी कर दी जाती तो यह नौबत क्यों आती? > प्रक्रिया चालू है। अगस्त में यदि एमसीआई की टीम आती तो यह स्थिति नहीं बनती।

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