नई दिल्ली. मुठभेड़ के फर्जी मामले रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत हर मुठभेड़ की जांच राज्य की सीआईडी से करानी होगी। जांच रिपोर्ट आने तक मुठभेड़ से जुड़े किसी सुरक्षाकर्मी को कोई वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा।
कोर्ट में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) ने मुंबई में फर्जी मुठभेड़ों का मसला उठाया था। शहर में 1995 से 1997 के बीच 99 मुठभेड़ में 135 लोगों की मौत हुई थी। संगठन ने ऐसे मामलों में दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की थी। इस पर चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय बेंच ने 16 बिंदुओं में दिशा-निर्देश जारी किए। इसमें सभी राज्यों की पुलिस को कार्रवाई करने को कहा गया है।
ग्वालियर-चंबल अंचल की पुलिस भी मुठभेड़ के कई मामलों में सवालों के घेरे में रही है। वर्ष 2000 में मुठभेड़ में मारा गया रामबाबू गड़रिया बाद में जिंदा निकला था। बताया जाता है कि वह मुठभेड़ में अपनी मौत की खबर सुनकर जंगल में जमकर हंसा था। वर्ष 2008 में डबरा-दतिया के जंगल में मारा गया पप्पू केवट भी झांसी जेल में जिंदा मिला था।
वर्ष 2009 में भिंड के बकनासा में हुए तीन बदमाशों के एनकाउंटर पर फर्जी एनकाउंटर का आरोप लगा था। अंबाह में वर्ष 2007 में फौजी एनकाउंटर, वर्ष 2004-05 में पिछोर में विशाल गड़रिया, डबरा में नरेश कमरिया, मेला ग्राउंड में तीन युवकों के एनकाउंटर, हुरावली रोड पर आकाश शर्मा, दो वर्ष पूर्व इनामी बदमाश के संदेह में एक निर्दोष युवक के फर्जी एनकाउंटर का मुद्दा भी उठा था।
बीस साल में अब तक सौ से ज्यादा को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन
ग्वालियर-चंबल संभाग में पिछले बीस साल में डकैत गिरोह शिवपुरी, श्योपुर, भिंड, मुरैना, दतिया में सक्रिय रहे हैं। इस दौरान डकैत गिरोहों से हुई मुठभेड़ों में सिपाही से लेकर सब इंस्पेक्टर तक लगभग सौ से ज्यादा लोग आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पा चुके हैं।