6 साल में ‘जीरो’ से कर दिए 39 टाइगर, अब मिला ईनाम
घायल होने के बाद भी लुटेरों को पकड़ा
वर्ष 2008-09 में जब पन्ना टाइगर रिजर्व (पीटीआर) में एक भी टाइगर नहीं बचा और मप्र ने टाइगर स्टेट का दर्जा खोया, उस समय चित्तूर (आंध्रप्रदेश) के रहने वाले और मप्र कैडर के आईएफएस अफसर आर श्रीनिवास मूर्ति को पन्ना भेजा गया। काम को जुनूनी अंदाज में करने वाले मूर्ति ने पीटीआर की कमान संभाली और छह साल की अपनी पोस्टिंग के दौरान बाघों की संख्या ‘जीरो’ से 39 पहुंचा दी। मूर्ति जुलाई 2015 तक पन्ना में रहे तब तक उन्हें देश के कई बड़े सम्मान मिले। किसी ने ‘बाघ मित्र’ का उपनाम दिया तो कोई उन्हें ‘अर्थ हीरो’ कहने लगा। राज्य सरकार ने अब जाकर 7 फरवरी को उन्हें पुरस्कृत किया है। यह उनके ही प्रयासों का परिणाम है कि पन्ना जहां सामंती प्रवृत्ति के लोग शिकार को शौक मानते थे, अब वही उनकी सुरक्षा में मदद करते हैं। टाइगर टूरिज्म भी दो से तीन गुना हो गया।
आज वहां 20 हजार पर्यटक हर साल आने लगे। अपनी 27 साल की सेवा में मूर्ति ने भोपाल अथवा दफ्तरी के काम सिर्फ 9 साल किए। 18 साल उन्होंने जंगलों में ही गुजारे।
ये सम्मान मिले
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने 2010 व 2014 में पन्ना टाइगर रिजर्व को उत्तम श्रेणी का दर्जा दिया। एनटीसीए ने ही 2012 व 2015 में अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस पन्ना टाइगर रिजर्व दिया।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने 2011 में ‘बाघ मित्र’ का खिताब दिया।
रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (आरबीएस) ने 2015 में ‘अर्थ हीरो’ पुरस्कार दिया।
कई बार अटकाए गए रोड़े
मई 2009 में पोस्टिंग के बाद बुंदेलखंड की सामंती व्यवस्था और डकैतों ने भी परेशान किया। बाघ पुनर्स्थापना योजना के तहत नवंबर 2009 में पेंच से एक नर बाघ व दो बाघिन मिली, लेकिन दस दिन में ही नर बाघ पार्क से बाहर चला गया। तभी कसम खाई और तय किया किया, अब ऐसा नहीं होने देंगे। जिद और जुनून के चलते मूर्ति व उनकी टीम ने न केवल बाघ को ढूंढा बल्कि उसे वापस पार्क में लाकर ही माने। फिर यहां बाघों का कुनबा बढ़ाने के लिए भोपाल के वन विहार से मादा बाघिन का यूरिन लेकर गए और जंगल में जगह-जगह स्प्रे किया ताकि नर बाघ उसकी गंध पाकर वहीं रुक जाए। सफलता मिली और पार्क में मौजूद एक बाघिन के साथ मेटिंग होने से चार शावक पैदा हुए।
यह सिलसिला फिर नहीं रुका। फिर इनकी सुरक्षा के लिए मूर्ति ने आम जनता, नेताओं और अन्य लोगों के समूहों से कई बार बात की। तब जाकर 2015 में पीटीआर में बाघों की संख्या 32 व पार्क के इर्द-गिर्द 7 हो गई।
दुनिया में पहला उदाहरण
कान्हा की दो बाघिनों को जंगली बनाने के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व भेजा गया। मूर्ति का कहना है कि दुनिया में यह पहला उदाहरण है कि पालतू बाघिनों को बिना किसी मदद के हमने जंगली बना दिया। यह भी अनोखा ही उदाहरण है कि पांच साल के कार्यकाल में अलग-अलग बाघिनों ने 18 बार बच्चे दिए, जिनसे 41 शावक पैदा हुए। छह की प्राकृतिक मौत हुई। बाकी जीवित हैं। अब तो यह स्थिति है कि एक बाघ भोपाल वन विहार को, एक सतपुड़ा नेशनल पार्क को और एक संजय गांधी टाइगर रिजर्व को दिया गया है। वर्ष 2011 में यह भी मप्र में पहली बार हुआ कि टाइगर का बर्थ डे मनाया गया। तब केंद्रीय वन मंत्री आए थे।
...तो बच्चों परिवारों को जोड़ा
शुरुआती दिनों में सामंती लोगों ने रुकावट पैदा करने की कोशिश की तो मूर्ति ने ‘पन्ना नेचर कैंप’ प्रारंभ किया। नवंबर से अप्रैल तक स्कूली बच्चों, परिवारों को जंगलों में ले गए और बताया कि टाइगर बुंदेलखंड का गौरव है। उसे बचाएं। इसके बाद फॉरेस्ट की इंटेलीजेंस और पुलिस ने भी मदद की।