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संस्कारों की पौध लगाएं, भावनाओं से उनको सींचें

4 वर्ष पहले
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पाठक संसद में शहर के चुनिंदा कवियों ने रचना पाठ किया। देवी अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय और हिंदी परिवार के इस कार्यक्रम में प्रदीप नवीन ने वर्तमान परिवेश में बाबा रामरहीम पर तंज़ करती रचना बीच खड़े यमराज सुनाई।

हंसा मेहता ने नसीहत देती कविता पढ़ी : मन का मंथन करना होगा / मानस में बैठी मलिनता को धोना होगा / जब तक न बदलेगी सोच हमारी / सारे उपाय व्यर्थ रहेंगे / संस्कारों का पौधे लगाएं / भावनाओं से उसको सींचें। नीलेश ठाकुर ने ढ़ांढस बंधाती हुई पंक्तियां सुनाई : वक्त भी करवट लेगा / ज़रा वक्त को वक्त तो लेने दो। डॉ. रमेशचंद्र ने ओज़ की ये पंक्तियां पढ़ी : मैं हवा का रुख मोड़ देना चाहता हूं / नफरतों के बंधनों को तोड़ देना चाहता हूं। दिनेशचंद्र तिवारी दिल में रोशनी क्यों बुझी बुझी सी है / जिन आंखों में ख्वाब सजना था मगर / उन आंखों में नमी नमी सी है कविता सुनाई। मुकेश इंदौरी, देवीलाल गुर्जर, ओम उपाध्याय, प्रियंका मालवीय ने रचनाएं सुनाई। संचालन हरेराम वाजपेयी ने किया।

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