नदी से तलाश की संसार की सर्वाधिक प्राचीन मुद्रा निष्क
डीबी स्टार इंदौर
छोटे आकार की वजह से आभूषण का या खेल-खिलौने का हिस्सा लगने वाली दुनिया की सर्वाधिक पुरानी मुद्रा का संग्रह गोविंददास मंगल के पास है। उन्होंने इस संग्रह को बनाने के लिए नदियों में मुद्रा की तलाश की। उनके संग्रह में लगभग 2000 प्रीवेंटिव मनी (वैदिक मुद्रा) शामिल है। इनका चलन 1700-400 ईस्वी पूर्व का माना जाता है। इस कालखंड को वैदिक युग और इन मुद्रा को निष्क कहा जाता है। साधनों की कमी और सुरक्षा के मद्देनजर इन्हें गले और हाथों में पहना जाता था।
बर्तन व्यवसायी गोविंददास (67) कॉमर्स ग्रेजुएट हैं। उन्हें वैदिक मुद्रा की ऐतिहासिक जानकारी 40 साल पहले प्रख्यात आर्कियोलॉजिस्ट पद्मश्री स्व. प्रो. विष्णु श्रीधर वाकणकर से मिली।
प्रकृति, जानवर, मानव और सभ्यता से जुड़े अंशों के आधार पर निष्क का निर्माण होता था। ये सोना, तांबा, लेड, हाथी दांत और पत्थर से बनती थी। जैसे-जैसे विकास होता गया मुद्रा भी विकसित होती चली गई।
रंग-रूप और आकार
वैदिक युग की गाय छाप मुद्रा
नर्मदा, क्षिप्रा आदि नदियों से मिली मुद्राएं
एनिमल- शेर, कछुआ, हाथी,ऊंट, मेंढक,सांप, बैल। वैदिक युग में गाय का महत्व सर्वाधिक था, इसलिए गाय की छाप वाली मुद्रा अधिक मिलती है। बैल के छोटे पैर और बड़ा धड़ होता था।
दुनियाभर में मानव सभ्यता का इतिहास नदी किनारे मिलता है। काली सिंध, क्षिप्रा, नर्मदा, शिवना जैसी नदियों में की गई तलाश के बाद निष्क मुद्राएं हासिल हुईं। इनकी तलाश के लिए गर्मी के चार महीने और फिर बारिश के बाद नदी में आई बाढ़ के उतरने का समय उपयुक्त माना जाता है।
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