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भिया, हम तो नी ही पेनेंगे हेलमेट!

5 वर्ष पहले
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अ ब ये टोपा पिना दिया आपने कि पेट्रोल भराना हे तो हेलमेट लगाओ! माथे को चोट से बचाना हेगा कि पेट्रोल से? भिया हेलमेट के मामले में बिफरे नजर आए, बोले हमने तो काकाजी के घाटे में बाल नी दिए और नी टोपी पेनी तो हेलमेट क्यों पेनें? कल से तो आप ये कहोगे कि हेलमेट पेन के आओ तो कचोरी/पोहे मिलेंगे। सुबे-पेली पानी आएगा तो आप कहोगे कि भीतर से हेलमेट लाके बताओ तो टोटी खोलने देंगे! और तो और पिक्चर जाते वक्त मल्टीप्लेक्स वाला बोलेगा हेलमेट दिखाओ तो टिकिट देंगे.. हद्द हे यार। जनता-जनार्दन यूंज मंदी के दौर से गुजर री हे, काम-काम के काम लगे हुए हैं और हेलमेट लाओ। पेली बात तो ये हे कि इंदौर में ट्रैफिक वैसेई धीमी गति का समाचार हो रिया हेगा तो एक्सीडेंट कां से होंगे..? अब सीनियर सिटीजन के बारे में तो कोई सोचता-बिचारता ही नहीं...अरे दादा को पेलेई सुनने में अड़चन हेगी और तुम पिना दो हेलमेट तो नी होता होगा तो हो जाएगा एक्सीडेंट। और नियम बनाने वालों को मालम नी हे कि भिया के बोलबाले ऐसे हेंगे कि पेट्रोल पम्प वाले भिया को खुद हेलमेट लाके देते हेंगे और केते हैं, भियाजी आप तो गुटका मसलो मैं करता हूं फुल टेंक। शहर में वैसे ही कजाने कोन-कोन से टेंसन लेके निकलना पड़ता हे और इसके बाद अलमारी में से हेलमेट हेड़ना रह गया तो और फजीता। अरे भिया जाने दो! फूटेगा माथा तो फूटने दो, कईं पे चपेट में आ गए तो कर लेंगे थोड़ा रिलेक्स। इसी बहाने पब्लिक रिलेक्सन का काम सल्टा लेंगे।

संजय पटेल

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