शुरू से ही विवादों में रही कुलपति चयन कमेटी
कुलपति चयन कमेटी शुरू से ही विवादों में रही है। पिछले साल 21 सितंबर को यूनिवर्सिटी ने कमेटी में प्रो. डीपी सिंह को चुना। उसी समय कुछ लोगों ने विरोध जताया था कि जो डीएवीवी के कुलपति रह चुके हैं और वर्तमान में यूजीसी की बॉडी नैक (नेशनल असेसमेंट एक्रिडिटेशन काउंसिल) के निदेशक हैं, उन्हें कमेटी में रखना नियम विरुद्ध होगा। फिर भी उन्हें रखा गया। कुछ दिन बाद प्रो. सिंह ने ही नाम वापस ले लिया।
29 अक्टूबर 2015 को कमेटी की फिर बैठक हुई। इसमें जोधपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. आर.पी. सिंह को सदस्य चुना गया। विवादों में आने के बाद उन्होंने भी नाम वापस ले लिया। इसके बाद 26 नवंबर 2015 को जस्टिस गुलाब शर्मा वोटिंग के जरिए सदस्य चुने गए। उनके चयन पर सवाल उठे कि प्रो. गणेश कावड़िया और प्रो. बी.के. गुप्ता भी वोटिंग में शामिल हुए, जो खुद कुलपति पद के लिए दावेदार थे। इस मामले में चौरड़िया ने कोर्ट में याचिका लगाई।
पसंद का व्यक्ति सदस्य बनाने की जुगाड़
विवादों के पीछे एक कारण यह भी आ रहा है कि कार्यपरिषद के कुछ सदस्य कुलपति पद की दौड़ में हैं। वह चाहते हैं कि उनकी पसंद का व्यक्ति कार्यपरिषद चुने, ताकि पैनल में उनका नाम आ जाए।
दो बार रद्द हुई बैठक
चयन कमेटी के तीन सदस्य एच. देवराज (चेयरमैन) और जस्टिस गुलाब शर्मा व डॉ. ए.के. लक्ष्मीनाथ थे। कमेटी की पहली बैठक 16 जनवरी को होना थी, लेकिन कोर्ट में मामला होने से उसे रद्द कर दिया। बाद में 2 फरवरी की तारीख तय हुई, लेकिन उस दिन भी बैठक नहीं हुई। आखिर में 8 फरवरी को बैठक हुई, जिसमें कमेटी ने कुलपति पद के लिए तीन नाम तय कर राजभवन को भेजे।
राजभवन कर सकता है मनोनयन
कमेटी में एक सदस्य राजभवन, दूसरा यूजीसी और तीसरा संबंधित विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद से चुनकर आता है। कार्यपरिषद द्वारा चुने गए सदस्यों के कारण ही कमेटी भंग हुई। ऐसे में विश्वविद्यालय अधिनियम में प्रावधान है कि राजभवन चाहे तो वह अपने स्तर पर तीसरे सदस्य को मनोनीत करके कमेटी की बैठक करवा सकता है।