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सिटी रिपोर्टर

5 वर्ष पहले
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गाड़ी सबसे पहले खां साहब को मिलना चाहिए

अब एफएम रेडियो को भारी लोकप्रियता मिली है लेकिन रेडियो को सरोकारों को बदलना होगा। प्रसारण केवल एक ही समूह से हटाकर समग्र समाज के लिए बनाना होगा। उसे मनोरंजन के साथ ज्ञान पर एकाग्र करना होगा। एक बार बड़े गुलाम अली खां साहब रेडियो आए तो उन्हें लाने-ले जाने के लिए रेडियो ने वाहन उपलब्ध कराया। स्टेशन डायरेक्टर ने जब प्रसारण के बाद जब खां साहब बैठे हुए मिले तो उन्होंने अधिकार से पूछा कि क्या वाहन नहीं है? तो उसने बताया कि फलां साहब को गाड़ी छोड़ने गई है। डाय
सिटी रिपोर्टर कहानीकार -चित्रकार प्रभु जोशी मानते हैं कि रेडियो ने लगभग कल्चर इंडस्ट्री की तरह भाषा और जीवन शैली को तराशा। इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि वेटिंग फॉर द गाडो जैसा नाटक सेम्युअल बैकेट ने बीबीसी के लिए लिखा और धर्मवीर भारती का अंधायुग भी रेडियो नाटक ही था।

वे कहत हैं भारत में जब रेडियो प्रसारण की शुरुआत हुई तो नेहरू इसे संस्कृति का वाहक बनाना चाहते थे इसलिए उन्होंने इसमें बड़े बड़े कलाकारों को एकत्र किया। पंडित रविशंकर रेडियो में रहे। नेहरू ने कलाकारों को सम्मानजनक पद दिया। लेकिन बाद मे यह सत्ता का भोपूं भी बन गया। हमारे यहां यदि दस करोड़ डॉक्टर-इंजीनियर हैं तो लगभग अस्सी करोड़ गायक हैं और यह रेडियो से फिल्म संगीत के प्रसारण से पैदा हुए। शास्त्रीय संंगीत यदि अाज भारत में बचा है तो यह केवल रेडियो के प्रसारण के कारण ही। इंदौर आकाशवाणी में स्वतंत्रकुमार ओझा जैसा महान रेडियो आर्टिस्ट इंदौर की देन है। यहां साहित्यकार इलाचंद्र जोशी, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रमेश बक्षी, शरद जोशी जैसे लेखक रहे। शास्त्रीय संगीत के लिए उस्तात अमीर खां साहब, रज्जब अली खां साहब और पंडित कुमार गंधर्व यहां आते रहे। लेकिन अब ये इतिहास की बात हो गई है।

रेडियो ने ही शास्त्रीय संगीत को जन-जन तक पहुंचाया
आज रेडियो डे पर उसकी यात्रा को बता रहे हैं प्रभु जोशी
सिटी एंकर
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