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एक नाज़ुक और कल्पनाशील स्पर्श

5 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर शहर के चित्रकार और सिरेमिक आर्टिस्ट सीरज सक्सेना का कहना है कि मिट्टी के साथ मेरा एक बहुत ही सहज और नैसर्गिक रिश्ता है। हमारा सभी का मिट्टी से एक नाता तो रहता ही है। बचपन से मिट्टी से खेल खेलते हुए, वह मिट्टी कब मेरे हाथ के नाज़ुक स्पर्श से कलाकृति में बदल गई।

यह कहना मुश्किल है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि इस मिट्टी ने ही मुझे गढ़ा है, मैंने मिट्टी को नहीं। यह बात सीरज सक्सेना ने सिटी भास्कर से बातचीत में कही। वे एक निजी या
एक नाज़ुक और कल्पनाशील स्पर्श
वे कहते हैं कि यह हम सब के साथ होता है कि हम बचपन में मिट्टी के साथ एक सहज खेल खेलते हैं। कई बार हमारे हाथ मिट्टी से सने होते हैं। हम मिट्टी को कई बार एक खिलंदड़ेपन से गूंधने की कोशिश करते हैं। मैं भी यही किया करता था। फिर कुछ बड़े होने के साथ यह खेल छूटता चला जाता है। मेरे साथ यह हुआ कि यह खेल उम्र बढ़ने के साथ रुका नहीं। मैं धीरे-धीरे सचेत होकर इस मिट्टी के साथ खेलने लगा। इस खेल में जब मिट्टी किसी आकार में बदलने लगी तो ध्यान गया कि यह एक कलाकृति में बदल सकती है। बस तभी से मिट्टी के इस खेल को गंभीरता से लेना शुरू किया और मैंने जाना कि इस मिट्टी के कितने खूबसूरत रूपाकार दिए जा सकते हैं। चित्रकार तो था ही लिहाजा रेखाओं से परिचित था लिहाजा हाथों के कल्पनाशीेल और संवेदनशील स्पर्श से मिट्टी को आकार देने लगा। यह यात्रा चित्रकारी के साथ निरंतर जारी है।

मिट्टी से खेलना ही मेरे कलाकार बनने की शुरुआत थी
शहर के चित्रकार और सिरेमिक कलाकार सीरज सक्सेना ने यह बात सिटी भास्कर से कही-
सिटी एंकर
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